Showing posts with label महिला सशक्तिकरण. Show all posts
Showing posts with label महिला सशक्तिकरण. Show all posts

देश में बिगड़ता लैंगिक अनुपात

भारत की जनगणना और कनाडा के मेडिकल शोध ने भारत में व्याप्त लैंगिक असामनता की समस्या को फिर ज्वलंत कर दिया है। आज भी देश में एक हजार किशोरों पर किशोरियों की संख्या 940 है। आगामी बीस वर्षो में लगभग दस से बीस प्रतिशत कम होगी। हर नौजवान अपने लिए एक उपयुक्त वधु की तलाश में नजर आएगा। उस देश में जहाँ वर्तमान में देश की राष्ट्राध्यक्ष, सत्ताधारी दल की मुखिया, सदन की अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष सब महिलाएं हंै, वहाँ ऐसी स्तिथियाँ शर्मनाक एवं चिंतनीय हैं। अपने देश में हर घर में शक्ति देवी दुर्गा, विद्या दायिनी सरस्वती की पूजा- अर्चना होती, हर आमो-खास धन लक्ष्मी की कमाना रखता है, ऐसे धर्मभीरु समाज में कन्या भ्रूणहत्या महा पाप है। देश का बहुसंख्य समाज माता के नाम पर साल में दो बार उपवास रखता है। देवताओं से ज्यादा मंदिर देवियों के है फिर भी ये सब हो रहा है। यह लैंगिक असंतुलन समाज के लिए बड़े व्यापक स्वरूप में नुकसान पहुँचाने वाला है। यद्यपि अभी भी हमारे देश में अंतरजातीय विवाहों का स्वागत नहीं किया जाता है, अनेक जातियों और उपजातियों में बटा देश अभी भी स्वजातीय विवाह के पक्ष में है, जिसके चलते कई समाज इस भ्रांति में है कि उनकी समाज में लैंगिक असंतुलन नहीं है, व सब ठीक है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है यह असंतुलन हर जाति, उपजाति के लिए घातक सिद्ध होगा वर्तमान आंकड़े इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि इस असंतुलन से कोई भी जाति या उपजति नहीं बचेगी सब पर इसका असर पड़ेगा। इस विषय में बने वर्तमान भारतीय कानून भी बहुत प्रभावकारी नहीं दिखे हैं, ऐसा लगता है कि अन्य कानूनों की भांति इसकी धार भी कुंद हो गयी है। इसके साथ ही जिस तरह से यह अपराध घटित होता है वो पूरी प्रक्रिया भी ऐसी है कि अपराधियों की पकड़ आसान नहीं है और पकड़ भी आ जाये तो कानून की कमजोरियों का लाभ ले मुक्त हो जाते हैं और फिर से समाज को गन्दा करने लगते हैं। आवश्यकता है कि सबसे पहले देश के वर्तमान कन्या भ्रूणहत्या कानून को और सशक्त किया जाये और इस विषय में कमजोर पड़ रही सामजिक सोच को भी बदलने और मजबूत करने की जरूरत है। क्योंकि देश की वर्तमान अभिभावक पीढ़ी शिशु के लिंग से लेकर उसका भविष्य तक सब कुछ अपने हिसाब से निर्धारित करना चाहती है, अपितु यह माता-पिता के रूप में उनका उत्तरदायित्व एवं अधिकार भी है, किन्तु इसमें सीमा से आगे जाने के कारण बच्चों का बचपन और भविष्य दोनों का ही हरण उनके अभिभावकों द्वारा ही किया जा रहा है। लैंगिक असंतुलन का नैतिक जिम्मा हम और आप सब का है क्योंकि इसके दुष्प्रभाव पूरे समाज पर होंगे ना कि सिर्फ किसी व्यक्ति विशेष मात्र पर। यह बात और है कि हम इस जिम्मेदारी को मानें या ना मानें। हम सब उस भारतीय समाज का ही भाग हैं जहाँ कन्या के साथ भ्रूण से लेकर भूमि तक हर जगह भेदभाव हो रहा है। खानपान, शिक्षा, उत्सव,आयोजन, पहनवा और स्वस्थ सब जगह अंतर स्पष्ट है। लड़के के जन्म पर जश्न और लड़की के जन्म पर शोक अभी भी होता है जो निहायत गैर जिम्मेदाराना और शर्मनाक है। अपने देश में साक्षरता की दर बढ़ती जा रही है किन्तु नैतिकता और नैतिक मूल्यों की दर घटी जा रही है। इस साक्षर और शिक्षित भारत में कन्या भ्रूणहत्या और भेदभाव इस पतन की जिन्दा मिसाल है। यदि हर माता -पिता लड़की और लड़के का भेद अपने मन से हटा दें तो आंकड़ों का यह भेद स्वत: ही मिट जायेगा। आज की स्थितियों से यह स्पष्ट है कि इस तरह कि समस्या कानूनी कम और सामाजिक ज्यादा है। इस सामाजिक मानसिकता को बदलने का जिम्मा देश की वर्तमान युवा पीढ़ी को ही उठाना होगा, जो कथित रूप से साक्षर तो है पर इन सब बातों से जिसके शिक्षित होने पर प्रश्न चिन्ह लगा है। जिस दिन हम और हमारा समाज यह तय कर ले उसी दिन यह बीमारी जड़ से मिट जायेगी व फिर यह किसी सरकारी नियम कानून की मोहताज भी नहीं रहेगी। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि हम प्यास लगने पर ही कुआँ खोदने का स्थान ढूंढने निकलते हैं। नदियां सूखाने लगी हैं तब पानी बचाने की बात हो रही है। गले -गले तक भ्रष्टाचार में डूब गए अब उबरने के प्रयास हो रहें हैं। लैंगिक असंतुलन में अभी बात ज्यादा बिगड़ी नहीं है। समय रहते हम जाग जाये तो आने वाले दस-बीस वषरें में युवतियों की संख्या, युवकों की संख्या के बराबर लाना मुश्किल नहीं, बशर्ते कोशिशें आज से और इमानदारी से शुरू कर दी जाये सिर्फ कन्या भ्रूण बचने के वर्ष में एक दिवस मनाने के बजाय रोजमर्रा की दिनचर्या, चर्चा और मानसिकता में इसे शामिल कर लिए जाये।
पंकज चतुर्वेदी
(लेखक एनडी सेंटर फार सोशल डेवलपमेंट एंड रिसर्च के अध्यक्ष हैं) दैनिक जागरण से साभार

नये दौर की, नये तेवर वाली गांव की लीडर

(ग्राम पंचायतों में महिला नेतृत्व पर उठने वाले सवाल अब पुराने होने लगे हैं , नए ज़माने की प्रतिनिधि अपने अधिकारों को पहचान उनका ग्राम विकास में बखूबी उपयोग कर रही हैं। महिला नेतृत्व को नए सिरे से परिभाषित करता मनोज कुमार का आलेख )
घर की चहारदीवारी और घूंघट में कभी अपना जीवन होम करने वाली ग्रामीण औरतें अब नये जमाने के साथ कदमताल कर रही हैं। वे नये तेवर के साथ मध्यप्रदेश के अलग अलग हिस्सों में यह जता दिया है कि वे एक बेहतर लीडर हैं जो न केवल घर सम्हाल सकती हैं बल्कि अवसर मिलने पर वे गांव की तस्वीर बदलने का माद्दा भी रखती हैं। मध्यप्रदेश के लिये यह नये किस्म का अनुभव है जब किसी ग्राम पंचायत की सरपंच अपने भ्रष्टाचारी सचिव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है तो कहीं गांधीगिरी के साथ ऐसे नाकाबिल सचिव के खिलाफ मैदान
में उतर आयी हैं। यह वही मध्यप्रदेश है जहां भ्रष्टाचार से लड़ने में नाकाम सरपंच अपने दायित्वों से पलायन कर जाती थीं लेकिन आज वे सक्सेस लीडर के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं।
पन्द्रह बरस से शायद कुछ अधिक ही हुआ होगा जब मध्यप्रदेश में पंचायतीराज व्यवस्था लागू की गई थी। महात्मा गांधी का सपना था कि सत्ता में ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी हो और इसके लिये वे पंचायतीराज व्यवस्था को लागू करने पर जोर दिया करते थे। उनकी मंशा थी कि इस व्यवस्था में स्त्रियों को बराबर का भागीदार बनाया जाए। महात्मा गांधी की सोच और सपने को सच करने की दृष्टि से मध्यप्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था लागू की
गई। अपने आरंभिक दौर में पंचायतीराज व्यवस्था के जो परिणाम मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल सका। खासतौर पर महिलाओं की सक्रियता नहीं के बराबर रही।
जहां महिलायें सक्रिय भी हुर्इं तो वहां उनकी छाया बनकर उनके पति या परिवारवाले जिम्मेदारी सम्हाले रहे। हर बात पर उनसे पूछ लें, का जवाब मिलता था। कई पंचायतों में प्रभावशाली लोगों के कारण महिलाओं को अपना पद
छोड़ना पड़ा था। भ्रष्टाचार का दानव और इस दानव के रूप में अपने पंजे में सीधी-सादी महिला सरपंचों को लपेटे में लिया जाने लगा था।
आहिस्ता आहिस्ता पंचायती राज व्यवस्था में बदलाव दिखने लगा। महिलाओं में सक्रियता आने लगी। कल तक छाया बने पति और परिवार वाले किनारे होने लगे और निर्वाचित महिला सरपंच और पंच अपनी सोच के अनुरूप फैसला लेने लगे। इसका प्रतिशत भी बहुत कम था लेकिन बदलाव का एक कदम भी अर्थवान हुआ करता है। आज हालत यदि पूरी तरह नहीं बदले हैं तो भी बदलाव की बयार चल पड़ी है। हाल ही में हुए पंचायतों के चुनाव में ऐसे कई दृश्य बदलते हुए देखने को मिले।
राज्य के कई ग्राम पंचायतों में पूरी की पूरी सत्ता महिलाओं के हाथों में आ गयी। कई पंचायतों में चुनावी प्रक्रिया को सरल बनाकर निर्विरोध निर्वाचन की प्रक्रिया अपनायी गयी और निर्विरोध महिलाओं की पंचायतें बन गयीं। इस समय मिले आंकड़ों को परखें तो दर्जन से भी ज्यादा पंचायतों में निर्विरोध चुनाव हुए हैं जहां सौफीसदी महिला पंच और सरपंचों के हाथों में सत्ता की चाबी है।
निर्वाचन प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद महिला सरपंचों का इम्तहान बाकि था। पहले से जमे पंचायत सचिव से काम लेना, पंचायत को प्राप्त बजट और विकास कार्य की रूपरेखा बनाना। अनेक पंचायतों में महिला सरपंचों को सचिव ने सहयोग किया लेकिन कुछेक पंचायतों में वे रोड़ा बन गये। घपले खुल जाने के डर और आगे की काली कमाई बंद हो जाने की चिंता में वे महिला सरपंचों से दो-दो हाथ करने जैसी स्थिति में खड़े थे लेकिन उन्हें इस बात का अहसास नहीं था कि जमाना बदल गया है। अब वे जिससे पंगा लेने की कोशिश कर रहे हैं, वे उनसे सुलह नहीं करेंगी बल्कि बाहर का रास्ता दिखाने से नहीं चूकेंगी।
कुछ ऐसा ही उदाहरण आदिवासी बहुल जिला मंडला के ग्राम पंचायत चिरईडोंगरी में देखने को मिला जहां सचिव की मनमानी के खिलाफ सरपंच सुषमा उइके ने विशुद्ध गांधीवादी ढंग से विरोध जाहिर किया। ग्राम पंचायत चिरईडोंगरी जिले नैनपुर विकासखंड में आता है जो जिला मुख्यालय से लगभग पैंतीस किलोमीटर की दूरी पर बसा है। चिरईडोंगरी ग्राम पंचायत की सरपंच श्रीमती सुषमा उइके का कहना था कि उनका सपना अपने गांव के विकास का था किन्तु ग्राम पंचायत सचिव सुजीतसिंह अपनी मनमानी के आगे काम करने में लगातार बाधा पैदा कर रहा था। यही नहीं वह मनमाने ढंग से चैक से भुगतान कर रहा है। पूछे जाने पर वह कोई जवाब नहीं देता है और जब मैंने चेक पर हस्ताक्षर करना बंद कर दिया तो वह मुझे पद से हटाने की धमकी देता है। सरपंच सुषमा
उइके को सीईओ से भी शिकायत है कि कई बार प्रभारी सचिव सुजीत के खिलाफ शिकायत करने के बाद भी कार्यवाही नहीं की गई और उल्टे सीईओ मुझे पद छोड़ देने की बात कहते हैं। अपने अधिकारों का उपयोग न कर पाने से दुखी सुषमा उइके गांधीवादी तरीके से पंचायत सचिव का विरोध करते हुए मजदूरी करने में जुट गयी हैं। उनका मानना है कि एक दिन तो उनकी बात सुनी जाएगी। पंचायत सचिव की हठधर्मिता और सीईओ के रूखे व्यवहार से सरपंच दुखी जरूर है लेकिन निराश नहीं। वह कहती है कि एक दिन वह अपना अधिकार पाकर ही रहेंगी।
चिरईडोंगरी की सरपंच सुषमा उइके की तरह गांधीवादी तरीका अपनाने के बजाय देवास जिले के ग्राम बरखेड़ा की सरपंच उर्मिला चौधरी ने जता दिया कि लीडर कैसा होता है। गांव में अनेक वर्षाें से जमे बेजाकब्जे पर बुलडोजर चलवा दिया। उर्मिला के इस साहस की गांव वाले तारीफ करते नहीं थकते हैं। इसके पहले भी पंचायत प्रतिनिधि रहे किन्तु किसी ने इस ओर कार्यवाही करने में रूचि नहीं दिखायी। देवास जिले के जनपद पंचायत टोंकखुर्द के ग्राम पंचायत बरखेड़ा की सरपंच उर्मिला दसवीं कक्षा तक शिक्षित है और उम्र कुलजमा बाईस
बरस। गांव वाले उर्मिला को सरपंच बिटिया के नाम से पुकारते हैं। सरपंच उर्मिला बताती है कि यह बेजाकब्जा अनेक लोगों ने कर रखा था जिससे आवागमन के लिये रास्ता नहीं था। पद सम्हालने के बाद सबसे पहले वह इस कब्जे को हटाकर पक्का रास्ता बनवाना चाहती थीं। बेजा कब्जा तो हटा दिया गया है और अब पक्का रास्ता बनाने का काम भी जल्द ही शुरू हो जाएगा।
राज्य के पंचायतों में अधिकारों के लिये महिला सरपंच केवल लड़ाई नहीं लड़ रही हैं बल्कि वे कानून में प्राप्त अपने अधिकारों को पाने के लिये सजग और सर्तक हैं। हरदा जिले के ग्राम पंचायत पानतलाई की उम्रदराज पचास बरस की आदिवासी सरपंच ढापूबाई अक्षरज्ञान करने निकल पड़ी हैं। इस उम्र में पढ़ाई करने की जरूरत क्यों पड़ी के सवाल के जवाब में सरपंच ढापूबाई कहती हैं कि गांव के विकास की जिम्मेदारी सम्हालने के लिये साक्षर होना जरूरी है। सरपंच ढापूबाई एक अनुशासित छात्रा की तरह गांव के शासकीय पाठशाला में दाखिला लिया है। यही नहीं, सरपंच ढापूबाई प्रतिदिन नियमित रूप से सुबह ग्यारह बजे कक्षा शुरू होने के पूर्व पहुंच जाती हैं और सायं पांच बजे तक कक्षा छूटने तक वे अध्ययनरत रहती हैं। ढापूबाई की मंशा तो बचपन से ही स्कूल जाने की थी लेकिन कई कारण थे जो उनके मन की नहीं हो पायी। अब वे गांव की जनप्रतिनिधि हैं और इस नाते वे साक्षर होना जरूरी समझती हैं।
बदलाव के इस दौर की खास बात यह है कि चिरईडोंगरी की सरपंच सुषमा उइके, ग्राम पंचायत बरखेड़ा की उर्मिला चौधरी हो या ग्राम पंचायत पानतलाई की उम्रदराज पचास बरस की आदिवासी सरपंच ढापूबाई किसी की जिम्मेदारी को पूरा करने में न तो पति हस्तक्षेप करते हैं और न परिवार वाले। जो सरपंच निर्वाचित हुई हैं, वे ही अपनी लड़ाई लड़ रही हैं, जिम्मेदारी पूरी कर रही हैं। राज्य में पंचायतों के लिये शिवराजसिंह सरकार ने पचास फीसदी आरक्षण देकर न केवल महिलाओं का सम्मान किया है बल्कि उनके आत्मविश्वास को और मजबूत किया है। यह बदलाव इस बात का प्रमाण है। कोई शक नहीं कि राज्य के पंचायतों में बदलाव की यह बयार बताती है कि नये जमाने की ये नयी लीडर विकास की नयी कहानी लिखेंगी।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं मीडिया अध्येता हैं)

आधी आबादी का सच - सम्मान और बराबरी की हकदार हैं महिलाऐं

विकास प्रक्रिया में महिलाओं का क्या योगदान है, इसका अनुमान दुनिया के 31 देशों में किये गये एक अध्ययन के निष्कर्षो से लगाया जा सकता है। इस निष्कर्ष में यह बात सामने आई थी कि महिलाऐं विभिन्न कार्यों में पुरुषों की अपेक्षा अधिक समय देती हैं। विकासशील देशों में महिलाऐं पुरुषों की तुलना में पुरुषों के मुकाबले 13 % और विकसित देशों में 6 % ज्यादा समय देती विश्व की आधी आबादी याने महिलाओं ने पुरुषों से जिस तरह कंधे से कंधा मिला कर कार्य किया है, उससे ही समूचा विश्व तरक्की और खुशहाली के रास्ते पर अग्रसर हो सका है। इसके बावजूद महिलाओं की भागीदारी को वह मान सम्मान नहीं मिल पाया है, जिसकी वह हकदार हैं। सबसे चोंकाने वाली बात यह है, कि भारत ही नहीं अपितु समूचे विष्व की महिलाऐं शोषित एवं पीड़ित हैं। विश्व में होने वाले कार्यो का 60 % कार्य महिलाऐं करतीं हैं लेकिन दुनिया भर की महिलाओं के हिस्से में 10 % जमीन का मालिकाना हक प्राप्त नहीं है अर्थात् 90 % से अधिक जमीन के मालिक पुरुष हैं। विश्व की आधी आबादी पुरुषों से अधिक घंटे कार्य करते हुए 13 % अधिक समय घरेलू कार्यो में भी लगाती हैं। इसके बदले उन्हें प्राप्त होता है पुरुषों से 30 से 40 % कम औसत वेतन । महिलाओं द्वारा पुरुषों की बराबरी से कार्य करने के बाद भी उन्हें कम वेतन और मजदूरी देना, उन्हें आर्थिक रुप से सशक्त बनने में बाधक सिद्ध होता है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी महिलाओं की स्थिति बेहतर नहीं है, इसी कारण उचित देखभाल के अभाव में लाखों महिलाऐं हर साल गर्भवती होने पर उसकी कठिन प्रक्रिया के दौरान अपने प्राण त्याग देती हैं,तो लाखों महिलाऐं असुरक्षित गर्भपात के कारण दम तोड़ देती हैं। गर्भ निरोध के लिए अपनाऐ जाने वाले स्थाई साधनों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव का खुलासा नसबंदी से हो जाता है जिससे 10 % से भी कम पुरुष नसबंदी करवाते हैं,जबकि 90 % से अधिक मामलों में महिलाओं को ही नसबंदी करवानी पड़ती है,जबकि महिलाओं की नसबंदी प्रक्रिया पुरुषों की तुलना से ज्यादा कठिन है। भारत में जनसंख्या वृद्धि के लिए महिलाओं को मुख्य रुप से दोषी ठहराया जाता है, जबकि इसमें पुरुष एवं परिवार की पुत्र प्राप्ति की लालसा मुख्य कारण होती है। गर्भावस्था एवं शिशु जन्म के दौरान देखरेख के अभाव में रक्त अल्पता एवं कुपोषण की शिकार बनकर रोगी बन जाती है यही कारण है कि भारत में महिलाओं की औसत आयु में भी कमी आई है। भारत जैसे देशों में महिला शिक्षा की कमी से नारी प्रगति को अवरुद्ध कर रखा है। एक ओर जहाँ केरल,महाराष्ट्र,तमिलनाडु और गुजरात जैसे राज्यों में महिला साक्षरता दर संतोषजनक है वहीं उत्तरप्रदेष,मध्यप्रदेष,राजस्थान,तथा बिहार, जैसे राज्यों में साक्षरता दर चिंताजनक है क्योंकि इन 4 प्रांतों में देश की बड़ी जनसंख्या निवास करती है (33।57 करोड़ 1991 की जनगणना अनुसार) कृषि क्षेत्र में भी महिलाओं का कार्य पुरुषों से अधिक है लेकिन वे सिर्फ श्रमिक बनकर रह गई हैं। भारत की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है जिससे महिलाओं की भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है जिसके तहत वे अपना योगदान अधिक से अधिक दे रहीं हैं। एक अध्ययन के अनुसार 78 % कृषक महिलाऐं 51 से 96 % तक कृषि कार्य पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर करती हैं। विकसित देशों की तुलना में भारत जैसे विकासशील देश की ग्रामीण महिलाऐं पुरुषों से औसतन दस गुना ज्यादा घंटे काम कर रहीं हैं। महिलाओं की घटती संख्या भी उनके साथ होने वाले भेदभाव को बयां करती हैं, 1901 में प्रति हजार पुरुषों पर 972 महिलाऐं थी जो 1991 में घटते 927 प्रति हजार पर पहुँच गई थी। उपरोक्त निष्कर्षों से यह बात सामने आती है,कि महिलाऐं वे सब काम कर रहीं हैं जो पुरुष करते हैं। इसके बावजूद यदि समाज महिलाओं की उपेक्षा करे, उनका शिक्षित होने का हक छीने, उनके समुचित विकास पर ध्यान न दे, पुरुषों के बराबर ऊॅंचा उठाने की कोशिश न करे तो वह समाज निश्चित रुप से विकास के रास्ते आगे नहीं बढ़ सकता है। महिलाओं को पर्याप्त सम्मान उनके कार्य को सराहना और बराबरी का दर्जा देना आज की पहली आवष्यकता है। मध्य प्रदेश के 6 जिलों टीकमगढ़,पन्ना,छतरपुर,डिण्डोरी,मंण्डला और बालाघाट जिलों में संचालित तेजस्विनी ग्रामीण महिला सषक्तिकरण कार्यक्रम में इन सभी बातों का समावेष किया गया है। योजनांतर्गत 180000 महिलाओं को संगठित कर सामाजिक,आर्थिक और राजनैतिक रुप से सषक्त बनाने के जमीनी प्रयास शुरु हो चुके हैं, परिणाम स्वरुप ग्रामीण महिलाओं में बदलाव के संकेत मिलने लगे हैं। महिलाऐं उनके विकास के तीन आधार स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार पर बाते करने लगी हैं।

सुशील कुमार वर्मा
जिला कार्यक्रम प्रबंधक
तेजस्विनी कार्यक्रम टीकमगढ़

सहस्त्राब्दि लक्ष्य और महिला सशक्तिकरण - महिला की जीत सबकी जीत है

बेहतरीन आलेख
"महिलाओं का सशक्तिकरण और उनमें निवेश टुकड़ों मे नहीं हो सकता है । इसे साधने की कोशिश किसी एक निर्धारित लक्ष्य को पाने के लिये की जा रही इक्का-दुक्का कार्यवाही तक ही सीमित नहीं कही जा सकती है, भले ही वह निकट भविष्य मे लाभकारी हो ।"
संयुक्त राष्ट्र ने 08 सहस्त्राब्दि लक्ष्य तय किये हैं जिन्हें वर्ष 2015 तक हासिल करने का वक्त तय किया गया है । इन्हीं 08 लक्ष्यों में से तीसरा लक्ष्य है स्त्री-पुरूष समानता और महिला शक्ति को बढ़ावा देना । संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान का कहना है कि ’’अगर 2015 तक सहस्त्राब्दि लक्ष्य हासिल करना है तो अब वक्त नहीं खोया जा सकता है, दुनियां की महिलाओं में निवेश करके ही हम इन लक्ष्यों को साधने की आशा करते हैं । तीसरा सहस्त्राब्दि लक्ष्य महिलाओं के खिलाफ भेदभाव को चुनौती देता है और लड़कियों और लड़कों को स्कूल जाने के लिए बराबरी का मौका देने की मांग करता है । इस लक्ष्य से जुड़े सूचकों का यह भी ध्येय है कि वो प्रगति का आंकलन करे जिससे यह सुनिश्चित हो कि ज्यादा से ज्यादा महिलाऐं पढ़ी लिखी हों, जननीति तय करने में उनकी आवाज और प्रतिनिधित्व हो, और उनके लिए नौकरी की बेहतर संभावनाऐं हों । लेकिन स्त्री पुरूष समानता का मुद्दा सिर्फ एक लक्ष्य तक सीमित नहीं है - यह सब पर लागू होता है । बगैर स्त्री पुरूष समानता के और महिलाओं के सशक्तिकरण के एक भी सहस्त्राब्दि लक्ष्य हासिल नहीं किया जा रहा है । पुरूषों से ज्यादा महिलाओं पर गरीबी का भार पड़ता है बच्चों की देखभाल का जिम्मा भी उन्हीं पर होता है । जीवनभर उन्हें हर क्षेत्र में और लगातार भेदभाव का शिकार होना पड़ता है । जब भी कोई महिला गर्भवती होती है उसका जीवन दाव पर होता है । एचआईवी एड्स जैसी भयानक बीमारियों का खतरा भी महिलाओं को बढ़ता ही जा रहा है । प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में महिलाओं की अनिवार्य भूमिका है, उन्हें पुरूषों जितने अधिकार मिलना चाहिए । महिलाओं के योगदान को पहचानने और उनके अधिकारों को सुरक्षित करने का असर आठों सहस्त्राब्दि लक्ष्यों पर पड़ेगा इन मुद्दों के निपटारे मे विफलता सहस्त्राब्दि लक्ष्यों को हासिल करने की कोशिश भी विफल कर देगी । महिलाओं के अधिकार सुरक्षित करने से सभी को चौतरफा फायदा होगा । सहस्त्राब्दि लक्ष्यों की कड़िया तंग नहीं बल्कि बहुत व्यापक हैं ।
लड़कियों का स्कूल पहुंचना सिर्फ उनके लिए ही कल्याणकारी नहीं है शोध से पता चला है कि कुछ सालों की ही प्राथमिक शिक्षा पाने वाली महिलाओं का आर्थिक भविष्य सुधरने की संभावनाऐं बढ़ जाती है, वो कम बच्चे पैदा करती हैं जो ज्यादा स्वस्थ्य होते हैं और अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए भी ये महिलाऐं ज्यादा तैयार होती हैं । परिवारों और समाज को इसका बहुत फायदा मिलता है । गरीबी घटाने की मुहिम पर भी इसका सीधा और अविलंब असर होता है ।
महिलाओं का सशक्तिकरण और उनमें निवेश टुकड़ों मे नहीं हो सकता है । इसे साधने की कोशिश किसी एक निर्धारित लक्ष्य को पाने के लिये की जा रही इक्का-दुक्का कार्यवाही तक ही सीमित नहीं कही जा सकती है, भले ही वह निकट भविष्य मे लाभकारी हो । जब तक स्त्री पुरूष समानता का मुद्दा केन्द्र बिन्दु नहीं बन जाता है, जो फिर बाकी मुद्दों को वापिस मानव विकास पर खींच के ले जा सके, जब तक कि विकासशील देशों की महिलाऐं समानता के लिए और जवाबदेही की मांग करते हुये एकजुट नहीं होती है, जब तक कि गरीब देशों की चुनौतियों से निपटने के लिए हम सब अपनी विशेष कार्यवाही को विस्तृत नहीं करते हैं और हम मिलजुलकर काम नहीं करते हैं हमारे वादे वादे ही रहेंगे।
(साभार-बहाना नहीं चलेगा 2015 द मिलेनियम कैम्पेन)
प्रस्तुतकर्ता
राजीव श्रीवास्तव
अतिरिक्त जिला कार्यक्रम प्रबंधक तेजस्विनी, छतरपुर

गरीब भगवती बाई ने साइकिल की दुकान खोली और बच्चों को खसरे से बचाया समूहों ने - टीकमगढ़ में समूहों की पहल

तेजस्विनी समूहों के माध्यम से महिलाओं के व्यवहार में परिवर्तन आने के साथ साथ अब वे अपने स्वयं के बल पर परिवर्तन का बीडा भी उठाने लगी हैं, समूह सदस्यों में जहाँ एक और अपने सरोकारों को लेकर जागरूकता आयी है वहीँ वे अब सामाजिक सरोकारों के मामले में भी पहल करने लगी हैं, जिला कार्यक्रम प्रबंधक कार्यालय से प्राप्त सफलताओं की इन दो सफल गाथाओं को ही देखें-
यह बात है नैगुवा लोकेशन के ग्राम गोराखास में महात्मा गांधी स्वसहायता समूह की है। इस समूह में वंशकार अहिरवार समाज की महिलायें शामिल हैं। समूह का गठन माह दिसम्बर में हुआ था। जिसमें कुल 20 महिलायें हैं। इस समूह की महिलाओं की आर्थिक स्थिति अत्यन्त खराब है। फिर भी यह 5 रू. प्रति सप्ताह के हिसाब से अपनी नियमित बचत जमा कर रही हैं। अभी समूह की बचत 1200 रू के लगभग एकत्र हो पायी थी कि समूह में लेनदेन के बारे में चर्चा चल रही थी। उसी समय समूह की सदस्य भगवती देवी जिसके पास आर्थिक तंगी के कारण घर का खर्च चलाने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है । उसके मन में बिचार आया कि यदि समूह से कुछ राशि उधार लेकर साइकिल मरम्मत की दुकान खोल ली जाय तो कुछ आमदनी होने लगेगी इसके लिये उसने समूह में 1000 रू. उधार लेने के लिये अपना प्रस्ताव रखा जिस पर समूह सदस्यों नें बिचार करने के बाद अगले सप्ताह उसे 1000 रू. 10 सप्ताह के लिये समान किस्त पर ऋण उपलब्ध करा दिया जिससे उसने साइकिल मरम्मत की दुकान खोल ली और काम शुरू कर दिया जिससे अभी शुरुआत में 20 से 25 रू प्रतिदिन की आमदनी होने लगी है और भगवती बाई के साथ समूह सदस्य सभी खुश हैं ।
ब्रजेश सिंह
लोकेशन समन्वयक - नैगुवां जिला - टीकमगढ़

यह बात है मड़िया लोकेशन के ग्राम कछियाखेरा की, यहां पर मार्च के प्रथम सप्ताह में शारदा स्वसहायता समूह की बैठक सुबह 8 बजे प्रारंभ हुई थी । इसी बैठक में उस दिन लोकेशन समन्बयक सुनील रावत मौके पर पहुंच गये बैठक में चार महिलायें उस समय उपस्थित नहीं थीं । इसका कारण जब समूह की महिलाओं से जाना गया तो उन्होंने बताया कि कि हमारे खिरक (परदेबारा) में बच्चों को छोटी माता निकली हैं जिसमें बुखार के साथ लगातार खांसी आ रही है बच्चे खाना भी नहीं खा रहे हैं जिससे समूह की महिलायें समूह की बैठक में नहीं आ सकीं । इस पर सुनील रावत द्वारा बताया गया कि यह खसरा का रोग है तथा इसके बारे में विस्तार से बताया तथा समूह ने उसी समय प्रेस बिज्ञप्ति तैयार की तथा इस बिज्ञप्ति को नई दुनिया प्रेस में दिया गया । जिसके प्रकाशित होते ही सामुदायिक स्वास्थय केन्द्र पृथ्वीपुर की पूरी टीम गांव में पहुंची जो जाकर सबसे पहले समूह की सदस्यों से मिली इसके बाद समूह के सदस्यों के सहयोग से पूरे गांव के सभी पीड़ित बच्चों का इलाज किया गया। इस घटना के बाद गांव की सभी महिलाओं को प्रेरणा मिली तथा समूह का महत्व समझ में आ गया।
सुनील रावत
लोकेशन समन्वयक - मड़िया,जिला - टीकमगढ़
(इस तरह की सफलता की कहानियों को अपने लोकेशन स्टाफ के साथ जरूर बांटे जो होंसला बढ़ने के साथ साथ नया रास्ता भी दिखाती हैं । इन कहानियों को सभी के साथ बांटने के लिए जिला कार्यालय को धन्यवाद और बधाई )

टीकमगढ़ - जरूरत नीचे तक जाने की

वास्तव में टीकमगढ़ को सुनहरे भूतकाल का क्षेत्र के नाम से जाना जाता है जो गलत भी नहीं है। प्रदेश के उत्तर में बसा ये जिला अपनी निहायत ही खूबसूरत भौगोलिक रचना और ठेठ अंदाज के लिये जाना जाता है। जिले में पिछड़ा वर्ग , अनुसूचित जाति के परिवारों की संख्या अधिक है । पिछड़ा वर्ग में लोधी समाज एवं अनुसूचित जाति में अहिरवार समाज के लोग बहुतायत में हैं ।
जिलें में सामंतवाद एवं ऊँच-नीच की भावना अक्सर देखने को मिलती है । सम्मान के नाम पर दलित वर्ग सम्पन्न लोगों के पैर छूता नजर आता है । यहां पर महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं है । कड़ी धूप में मजदूरी करना, घरेलू काम करना महिलाओं की जिंदगी का हिस्सा बना हुआ है । मजबूरीवश अनेकों महिलाऐं मजदूरी के लिए दिल्ली , आगरा जैसे शहरों में जाती रहती है । यही स्वास्थ्य से जुड़ी भयावह स्थिति की एक खास वजह है, जो अपने साथ HIV/Aids तथा STD व अन्य शारीरिक व मानसिक रोगों को साथ लाती है। इसके साथ ही पर्दा प्रथा यहां काफी गहरे तक जड़ जमाये हुये है । स्वास्थ्य जैसे मुद्दे पर भी जागरूकता का नितांत अभाव है यही कारण है कि जिले में मातृ मृत्यु दर (876 प्रतिलाख) एवं शिशु मृत्युदर ( 93 प्रति हजार) अन्य की तुलना में अधिक है । मातृ मृत्यु दर के मामले में सर्वाधिक गंभीर स्थिति पृथ्वीपुर ब्लाक की है जहां प्रति लाख प्रसव पर 1381 महिलाऐं मौत का शिकार बनती है वही शिशु मृत्युदर 114 प्रति हजार है । यह अत्यंत चिंता का विषय है ।जिले में महिलाओं की जगह अभी चार दिवारी तक सिमटी नजर आती है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे उन्होंने बाहरी दुनिया देखी ही नहीं है । इसके विपरीत स्वशक्ति कार्यक्रम के तहत बनाये गये स्वसहायता समूहों से जुड़ी रही महिलाओं में जागरूकता देखी जा सकती है लेकिन उनके लिए भी आजीविका संबंधी कार्यक्रम संचालित करने की आवश्यकता है ।अन्य स्वसहायता समूह जैसे एस0जी0एस0वाई0 से जुड़ी महिलाओं के सोच विचार में बदलाव बहुत कम नजर आता है । पैक्स परियोजना में गठित समूह की महिलाऐं केवल आर्थिक रूप से थोड़ा सक्षम नजर आती है ।
साक्षरता जैसे विषय पर जिले में कुछ भी हलचल दिखाई नहीं देती है । गाँवों में संचालित पुस्तकालय संचालकों को सालों से मानदेय नहीं मिला है जो उनकी साक्षरता के कार्य में रूचि न होने का कारण है । जिले में पुरूष साक्षरता एवं महिला साक्षरता में लगभग 28 % का अंतर है।
ग्राम पंचायत में भागीदारी के विषय में जिले की महिलाओं की उपस्थिति नगण्य सी है, वे तो इस बारे में न तो सोच सकी है और न जान सकी हैं । तेजस्विनी कार्यक्रम के तहत बनाये गये समूहों में इस बाबत कार्य किया जा रहा है।
निरंतर बढ़ता लिंगानुपात भी जिले के लिये चिंता का विषय है यहां प्रति हजार पुरूषों पर 886 महिलाऐं है । इस विषय में कोई विशेष कार्यक्रम संचालित नहीं हुआ है । जिले के कुछ गांवों में तो उड़ीसा से महिलाओं को लाकर शादी की गई है जो अत्यंत चिंता का विषय है । तेजस्विनी कार्यक्रम के दौरान इस विषय पर भी कार्य किया जाना चाहिये।
जिले की सबसे चिंतनीय स्थिति खुले में शौच जाने से संबंधित है । विकल्पहीनता के चलते खुले में शौच महिलाओं की मजबूरी है । इसके साथ ही दूर से पानी लाना भी महिलाओं के लिए दुष्कर कार्य है लेकिन समाज के पूर्वाग्रहों के कारण यह काम महिलाओं को ही करना पड़ रहा है । बाल-विवाह जैसी गंभीर समस्या से भी जिला अछूता नहीं है । यहां अनेकों बालिकाऐं कम उम्र में ब्याह दी जाती है । जिससे उनका विकास अवरूद्ध हो जाता है ।
तेजस्विनी कार्यक्रम में महिला समानता के लिए किए जा सकने वाले प्रयास :-
ग्राम पंचायतों में भागीदारी एवं इससे संबंधित प्रशिक्षण /जानकारी देना सबसे पहली जरूरत है । यदि महिलाऐं इसके विषय में जानेगी, उसके बाद ही हम सत्ता में भागीदारी या आरक्षण का लाभ लेने की बात कह सकेंगें ।
महिला स्वास्थ्य की ग्रामीण क्षेत्रों में अत्याधिक अनदेखी की जाती है । यही कारण है कि महिलाऐं कमजोर हो जाती है और बीमारियों की शिकार हो जाती है । इस हेतु जागरूकता के लिए कार्य करने एवं स्वास्थ्य विभाग से प्रभावी समन्वय करने की आवश्यकता है । महिलाओं को आर्थिक रूप से आगें बढ़ाने में स्व-सहायता समूह प्रमुख भूमिका निभा सकते है । लेकिन इसका सही क्रियान्वयन अन्य योजनाओं में नहीं हो पा रहा है । समूह बनाऐ जाते है, जो कुछ समय बाद टूट जाते है । अतः तेजस्विनी में इसका ध्यान रहते हुए महिलाओं के लिए आजीविका के बेहतर अवसर उपलब्ध कराये जाने की आवश्यकता है ताकि वें आर्थिक रूप से सक्षम हो सकें ।
साक्षरता में आमतौर पर महिलाओं की रूचि सामयिक होती है । कुछ दिन उत्साह दिखाने के बाद वें इससे विमुख हो जाती है । अतः साक्षरता में ऐसा प्रयास हो कि उनका पाठ्यक्रम चित्रात्मक एवं रूचिकर हो ।
ग्रामीण क्षेत्र में जन समुदाय के लिए जन्म से लेकर मृत्यु तक शासन की विभिन्न योजनाऐं संचालित है।जिनमें से अनेकों योजनाऐ महिलाओं से संबंधित है और पुरूषों के समान बराबरी का एहसास कराती है । इन योजनाओं का लाभ लेना, सिखाने का प्रयास सुव्यवस्थित रणनीति के तहत किए जाने की आवश्यकता है ।
लिंगानुपात में आ रही असमानता को दूर करने की रणनीति बनाने की आवश्यकता है । जिसके तहत महिला एवं पुरूष दोनों के लिए जागरूकता कार्यक्रम हों ।
घरेलू हिंसा गरीब परिवारों में बहुत ज्यादा होती है । लेकिन ये घटनाएं घर तक ही सिमट कर रह जाती है । अतः रणनीति इस तरह हो जो पीड़ित महिला को हिंसा से बचा सकें । इस हेतु विषय विशेषज्ञों की एक प्रशिक्षित टीम समूहों में जाकर प्रशिक्षण एवं सकारात्मक परामर्श दे सकें ।
महिलाओं को कानूनी साक्षरता का भी सरलतम तरीके से प्रशिक्षण एवं परामर्श दिए जाने की आवश्यकता है ।
महिलाओं के घरेलू काम के घण्टों को कभी भी गिना नहीं जाता है जबकि वह पुरूषों से अधिक श्रम करती है । अतः कड़ी मजदूरी में कमी हेतु छोटे-छोटे कम लागत के कृषि यंत्र, कुओं पर पुली लगाना, उन्नत चूल्हों , सोलर कुकर का इस्तेमाल सिखाना, घरेलू कार्यों में पुरूषों की भागीदारी बढ़ाने के प्रयास उसके श्रम में कमी ला सकते है ।
श्री सुशील वर्मा
जिला कार्यक्रम प्रबंधक
टीकमगढ़

जनजातीय समुदाय और महिला सशक्तिकरण

महिलाओं को किताबों में कितना भी ऊंचा स्थान दिया गया हो परंतु समाज में उनकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। जहां तक विभिन्न जनजातीय समुदायों में महिलाओं की स्थिति का प्रश्न है, उसे भी आदर्श नहीं कहा जा सकता।
हम जानते हैं कि जनजातीय समुदायों में समाज की संरचना एवं संचालन परंपराओं के आधार पर होता है। किन्तु परम्परा के प्रस्थान बिन्दु को चिन्हित करना बहुत ही कठिन कार्य है। परम्पराएं परिवर्तनशील होती हैं। उनकी आलोचना की जा सकती है; परन्तु, परम्पराशून्य होकर जनजातीय समुदाय स्वयं को जीवित नहीं रख सकते।
भारत में ज्यादातर जनजातीय समुदाय पितृ सत्तात्मक हैं। किंतु उत्तर-पूर्वी राज्यों के कुछ क्षेत्रों में मातृ सत्तात्मक परिवार पाए जाते हैं। मातृसत्तात्मक समुदायों में परिवार का नेतृत्व महिलाओं के पास होता है। उनके अधिकार और दायित्व पुरुषों से अधिक माने जाते हैं।
सामाजिक संरचना का जो भी स्वरूप हो, प्राय: सभी जनजातीय समुदायों में महिलाएं पुरुष की तुलना में अधिक श्रम करती हैं। वे परिवार की अर्थ-व्यवस्था की धुरी होती हैं और उनकी राय को महत्व दिया जाता है।
कुछ जनजातीय समुदायों में वधू मूल्य की परम्परा के कारण कन्या के जन्म को सकारात्मक भाव से देखा जाता है। क्योंकि, वधू मूल्य कन्या के पिता को प्राप्त होता है। वैसे यह आदर्श परंपरा नहीं है किन्तु जनजातीय समाज में कन्या भ्रूण हत्या का न होना इसकी एक बड़ी वजह है। जनजातीय विधवाओं के पुनर्विवाह को स्वीकृति दी जाती है। तलाक की स्थिति में भी विवाह करने की छूट है। जनजातीय समुदाय सदियों से जंगलों में रहते आए हैं। वे इन जंगलों के संरक्षण को लेकर बहुत सतर्क रहते हैं। इसमें महिलाओं की ही भूमिका अधिक होती है।
आदिवासी महिलाएं सांस्कृतिक एवं सामाजिक दृष्टि से सशक्त हैं। स्वावलम्बन उनका प्राकृतिक गुण है। किंतु आज जनजातीय महिलाएं अपने संक्रमण काल से गुजर रही हैं। सदियों से चली आ रही उनकी परंपराएं बदल रही हैं। बाहरी दुनिया से जनजातीय समुदायों का संपर्क तेजी से बढ़ा है। लेकिन दुर्भाग्यवश उनपर बाहरी दुनिया की अच्छाइयों का कम जबकि बुराइयों का अधिक प्रभाव पड़ रहा है। इससे महिलाएं भी अछूती नहीं हैं।
भीलों में वधू धन देने का रिवाज था। लेकिन अब वहां दहेज प्रथा का प्रचलन भी बढ़ रहा है। यह उनके गैर-जनजातीयकरण का नतीजा है। जनजातीय लड़कियों को अध्ययन के लिए सरकार की तरफ से कई सुविधाएं दी जा रही हैं। लेकिन, उपयुक्त वातावरण न मिलने के कारण उनके मन में हिचक है। ये परिवार एक प्रकार से अर्थ प्रधान हैं, क्योंकि जीविकोपार्जन की समस्या उनके लिए सबसे बड़ी है। इस कारण शिक्षा अब तक आदिवासियों की प्राथमिकता नहीं बन पायी है। पुरुष द्वारा कर्ज लेने की प्रवृत्ति के कारण भी महिलाओं की स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। उन्हें भी परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बंधुआ मजदूरी करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
विभिन्न जनजातियों में लोग अपने लड़कों को विद्यालयों में और बाद में महाविद्यालयों में भेज रहे हैं। लेकिन, लड़कियों को भेजने के मामले में उतना उत्साह नहीं है। जनजातीय महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए जो भी रूपरेखा बनाई जाए, उसमें इस बात को अवश्य ध्यान में रखा जाए कि इन महिलाओं को भी नवयुग का सामना करना है। यहां रूढ़ियों और परम्पराओं में अंतर करना होगा। परम्पराएं एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होनी चाहिएं किंतु रूढ़ियों के मामले में ऐसा नहीं होना चाहिए।
विभिन्न जनजातियों में प्रचलित परम्परागत समाज संचालन विधियों का अध्ययन कर विसंगतियों व असमानताओं को दूर करने की दिशा में पहल की जानी चाहिये। विवाह, तलाक, पुनर्विवाह, परिवार की सम्पत्ति में हिस्सा, स्वयं द्वारा अर्जित आय को खर्च करने का अधिकार तथा परिवारिक प्रकरणों में महिलाओं की सहभागिता व उनकी सलाह को महत्व दिलाने की दिशा में एक ऐसी नीति बने जो न्यायोचित और वर्तमान समय की आवश्यकताओं के अनुरूप हो। वास्तव में हमें एक ऐसे माडल की तलाश करनी होगी जो भारतीय चिंतन से परिपुष्ट हो।
-आशा शुक्ला
www.bhartiyapaksh.com से साभार

सिर्फ़ दिवस मनाने से नहीं होगा महिला सशक्तिकरण

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से मुझे पता नहीं क्यों विश्व हिंदी दिवस की भी याद आ गई। क्यों मनाते हैं ये दिवस? क्यों 'अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस' या 'विश्व अंग्रेज़ी दिवस' नहीं होते? क्या इस वजह से कि आज भी महिला और हिंदी बेचारी है? आज भी उनकी और ध्यान दिलाए जाने की ज़रूरत है? मैं दुनिया भर की सभी महिलाओं की प्रतिनिधि तो नहीं हूँ लेकिन मेरे आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती है जब मुझ पर 'दुखिया' या 'बेचारी' या 'वंचित' या 'अबला' का ठप्पा लगाया जाता है।
इसमें शक नहीं है कि आज भी अनगिनत महिलाएँ जीवन की मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। लेकिन दुखियारे पुरुष भी तो हैं. ग़रीबी और अशिक्षा सबसे बड़े अभिशाप हैं और वे लिंगभेद नहीं करते. साल में एक बार दिन मनाए जाने से बेहतर होगा कि साल के 365 दिन समाज के उन उपेक्षित वर्गों को समर्पित किए जाएँ जिनकी ओर न किसी सरकार का ध्यान जाता है और न ही व्यवस्था का।
उपलब्धि क्या है?
आख़िर, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की उपलब्धि क्या होती है? जगह-जगह समारोह, भाषणबाज़ी, बड़े-बड़े संकल्प और वायदे। और फिर स्थिति जस की तस। हाँ, यदि महिलाओं की स्थिति सुधारने का बीड़ा उठाया ही है तो उसकी शुरुआत कन्या भ्रूण से की जानी चाहिए। पहले तो उसे जन्म लेने का, जीने का, साँस लेने का अधिकार हो। फिर उसे कुपोषण से बचाया जाए. भारत में 6-14 वर्ष आयुवर्ग की लड़कियों पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार कोलकाता में उनमें से 95 प्रतिशत, हैदराबाद में 67 प्रतिशत, दिल्ली में 73 प्रतिशत और चेन्नई में 18 प्रतिशत अनीमिया यानी ख़ून की कमी का शिकार हैं.
इसके अलावा उसकी शिक्षा का पूरा इंतज़ाम हो। एक पुरानी कहावत है कि एक पुरुष को शिक्षित बनाने का अर्थ है एक व्यक्ति को शिक्षित बनाना। जबकि एक महिला शिक्षित होती है तो पूरा परिवार शिक्षित होता है. लड़कियों की शिक्षा पर बहुत ज़्यादा ध्यान न दिए जाने के बावजूद आँकड़े बताते हैं कि भारत में महिला डॉक्टरों, सर्जनों, वैज्ञानिकों और प्रोफ़ेसरों की तादाद अमरीका से ज़्यादा है। सिर्फ़ दफ़्तर में काम करने वाली ही कामकाजी महिलाएँ नहीं होती हैं, ज़रा सोच कर देखिए थोड़ा सा सहारा या सहायता महिला को किन ऊँचाइयों तक ले जा सकती है।
लेकिन यह सहारा अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाने से नहीं मिलेगा। यह मिलेगा अपने आसपास के परिवेश से. अपने घर-परिवार से।
ज़िम्मेदारी परिवार की
जिस दिन माता-पिता बेटी को बोझ समझना बंद करके बेटे के बराबर का हक़ देने लगेंगे, स्थितियाँ बदल जाएँगी। भारत की पहली महिला पुलिस अधिकारी और जुझारू व्यक्तित्व की मालिक किरण बेदी ने बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर समाज की कुछ वंचित महिलाओं के बारे में अपने एक लेख में ऐसी ही एक सलाह दी थी।
उन्होंने कहा था, "मैने उन तमाम स्त्रियों को समझाया कि जो चीज़ें उन्हें इतनी कोशिशों के बाद मिली हैं, मुझे वे सब मेरे माता-पिता ने जन्म से ही दिया था... इसलिए बेटियाँ वही बनती हैं जो उनके माता-पिता उन्हें बनाना चाहते हैं, और अगर उन महिलाओं के माता-पिता चाहते तो उन्हें भी ये सब मिल सकता था".
आज महिला मुक़ाबला पुरुष से नहीं कर ही है। वह समानता चाहती है महिला से ही। शहरी महिला और ग्रामीण महिला की खाई बहुत व्यापक है.
सुविधाएँ शहरो में पढ़ी-लिखी महिलाओं तक पहुँच रही हैं लेकिन गाँव की अनपढ़ महिला आज चाहे सरपंच की कुरसी पर बिठा दी जाए, वह आत्मनिर्भर नहीं है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस तभी सार्थक हो सकता है जब महिलाओं को एक खांचे में न रख कर उन महिलाओं की तलाश की जाए जिन्हें रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं है और फिर उन पर ही ध्यान केंद्रित किया जाए।
लेकिन यह काम करेगा कौन? हम और आप जैसे लोग ही न...तो इंतज़ार किस बात का है?