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देश में बिगड़ता लैंगिक अनुपात

भारत की जनगणना और कनाडा के मेडिकल शोध ने भारत में व्याप्त लैंगिक असामनता की समस्या को फिर ज्वलंत कर दिया है। आज भी देश में एक हजार किशोरों पर किशोरियों की संख्या 940 है। आगामी बीस वर्षो में लगभग दस से बीस प्रतिशत कम होगी। हर नौजवान अपने लिए एक उपयुक्त वधु की तलाश में नजर आएगा। उस देश में जहाँ वर्तमान में देश की राष्ट्राध्यक्ष, सत्ताधारी दल की मुखिया, सदन की अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष सब महिलाएं हंै, वहाँ ऐसी स्तिथियाँ शर्मनाक एवं चिंतनीय हैं। अपने देश में हर घर में शक्ति देवी दुर्गा, विद्या दायिनी सरस्वती की पूजा- अर्चना होती, हर आमो-खास धन लक्ष्मी की कमाना रखता है, ऐसे धर्मभीरु समाज में कन्या भ्रूणहत्या महा पाप है। देश का बहुसंख्य समाज माता के नाम पर साल में दो बार उपवास रखता है। देवताओं से ज्यादा मंदिर देवियों के है फिर भी ये सब हो रहा है। यह लैंगिक असंतुलन समाज के लिए बड़े व्यापक स्वरूप में नुकसान पहुँचाने वाला है। यद्यपि अभी भी हमारे देश में अंतरजातीय विवाहों का स्वागत नहीं किया जाता है, अनेक जातियों और उपजातियों में बटा देश अभी भी स्वजातीय विवाह के पक्ष में है, जिसके चलते कई समाज इस भ्रांति में है कि उनकी समाज में लैंगिक असंतुलन नहीं है, व सब ठीक है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है यह असंतुलन हर जाति, उपजाति के लिए घातक सिद्ध होगा वर्तमान आंकड़े इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि इस असंतुलन से कोई भी जाति या उपजति नहीं बचेगी सब पर इसका असर पड़ेगा। इस विषय में बने वर्तमान भारतीय कानून भी बहुत प्रभावकारी नहीं दिखे हैं, ऐसा लगता है कि अन्य कानूनों की भांति इसकी धार भी कुंद हो गयी है। इसके साथ ही जिस तरह से यह अपराध घटित होता है वो पूरी प्रक्रिया भी ऐसी है कि अपराधियों की पकड़ आसान नहीं है और पकड़ भी आ जाये तो कानून की कमजोरियों का लाभ ले मुक्त हो जाते हैं और फिर से समाज को गन्दा करने लगते हैं। आवश्यकता है कि सबसे पहले देश के वर्तमान कन्या भ्रूणहत्या कानून को और सशक्त किया जाये और इस विषय में कमजोर पड़ रही सामजिक सोच को भी बदलने और मजबूत करने की जरूरत है। क्योंकि देश की वर्तमान अभिभावक पीढ़ी शिशु के लिंग से लेकर उसका भविष्य तक सब कुछ अपने हिसाब से निर्धारित करना चाहती है, अपितु यह माता-पिता के रूप में उनका उत्तरदायित्व एवं अधिकार भी है, किन्तु इसमें सीमा से आगे जाने के कारण बच्चों का बचपन और भविष्य दोनों का ही हरण उनके अभिभावकों द्वारा ही किया जा रहा है। लैंगिक असंतुलन का नैतिक जिम्मा हम और आप सब का है क्योंकि इसके दुष्प्रभाव पूरे समाज पर होंगे ना कि सिर्फ किसी व्यक्ति विशेष मात्र पर। यह बात और है कि हम इस जिम्मेदारी को मानें या ना मानें। हम सब उस भारतीय समाज का ही भाग हैं जहाँ कन्या के साथ भ्रूण से लेकर भूमि तक हर जगह भेदभाव हो रहा है। खानपान, शिक्षा, उत्सव,आयोजन, पहनवा और स्वस्थ सब जगह अंतर स्पष्ट है। लड़के के जन्म पर जश्न और लड़की के जन्म पर शोक अभी भी होता है जो निहायत गैर जिम्मेदाराना और शर्मनाक है। अपने देश में साक्षरता की दर बढ़ती जा रही है किन्तु नैतिकता और नैतिक मूल्यों की दर घटी जा रही है। इस साक्षर और शिक्षित भारत में कन्या भ्रूणहत्या और भेदभाव इस पतन की जिन्दा मिसाल है। यदि हर माता -पिता लड़की और लड़के का भेद अपने मन से हटा दें तो आंकड़ों का यह भेद स्वत: ही मिट जायेगा। आज की स्थितियों से यह स्पष्ट है कि इस तरह कि समस्या कानूनी कम और सामाजिक ज्यादा है। इस सामाजिक मानसिकता को बदलने का जिम्मा देश की वर्तमान युवा पीढ़ी को ही उठाना होगा, जो कथित रूप से साक्षर तो है पर इन सब बातों से जिसके शिक्षित होने पर प्रश्न चिन्ह लगा है। जिस दिन हम और हमारा समाज यह तय कर ले उसी दिन यह बीमारी जड़ से मिट जायेगी व फिर यह किसी सरकारी नियम कानून की मोहताज भी नहीं रहेगी। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि हम प्यास लगने पर ही कुआँ खोदने का स्थान ढूंढने निकलते हैं। नदियां सूखाने लगी हैं तब पानी बचाने की बात हो रही है। गले -गले तक भ्रष्टाचार में डूब गए अब उबरने के प्रयास हो रहें हैं। लैंगिक असंतुलन में अभी बात ज्यादा बिगड़ी नहीं है। समय रहते हम जाग जाये तो आने वाले दस-बीस वषरें में युवतियों की संख्या, युवकों की संख्या के बराबर लाना मुश्किल नहीं, बशर्ते कोशिशें आज से और इमानदारी से शुरू कर दी जाये सिर्फ कन्या भ्रूण बचने के वर्ष में एक दिवस मनाने के बजाय रोजमर्रा की दिनचर्या, चर्चा और मानसिकता में इसे शामिल कर लिए जाये।
पंकज चतुर्वेदी
(लेखक एनडी सेंटर फार सोशल डेवलपमेंट एंड रिसर्च के अध्यक्ष हैं) दैनिक जागरण से साभार

अच्छी खबर सबके लिए

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पंचायती राज - पंचायतों का सशक्तीकरण

सुधीर तिवारी
पंचायती राज संस्थायें भारत में लोकतंत्र की मेरूदंड है। निर्वाचित स्थानीय निकायों के लिए विकेन्द्रीकृत, सहभागिय और समग्र नियोजन प्रक्रिया को बढाव़ा देने और उन्हें सार्थक रूप प्रदान करने के लिए पंचायती राजमंत्रालय ने अनेक कदम उठाए हैं।

पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष (बीआरजीएफ)
इस योजना के तहत अनुदान प्राप्त करने की अनिवार्य शर्त विकेन्द्रीकृत, सहभागिय और समग्र नियोजन प्रक्रियाको बढाव़ा देना है। यह विकास के अन्तर को पाटता है और पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई) और उसकेपदाधिकारियों की क्षमताओं का विकास करता है। हाल ही में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि स्थानीयआवश्यकताओं को पूरा करने में बीआरजीएफ अत्यधिक उपयोगी साबित हुआ है और पीआरआई तथा राज्योंने योजना तैयार करने एवं उन पर अमल करने का अच्छा अनु प्राप्त कर लिया है। बीआरजीएफ के वर्षके कुल 4670 करोड़ रुपए के योजना परिव्यय में से 31 दिसबर, 2009 तक 3240 करोड़ रुपए जारीकिये जा चुके हैं।

-गवर्नेंस परियोजना
2009-10 एनईजीपी के अन्तर्गत ईपीआरआई की पहचान मिशन पद्धति की परियोजनाओं के ही एक अंग के रूप में की गईहै। इसके तहत विकेन्द्रीकृत डाटाबेस एवं नियोजन, पीआरआई बजट निर्माण एवं लेखाकर्म, केन्द्रीय और राज्यक्षेत्र की योजनाओं का क्रियान्वयन एवं निगरानी, नागरिक-केन्द्रित विशिष्ट सेवायें, पंचायतों और व्यक्तियों कोअनन्य कोड (पहचान संख्या), निर्वाचित प्रतिधिनियों और सरकारी पदाधिकारियों को ऑन लाइन स्वयं पठन माध्यम जैसे आईटी से जुड़ी सेवाओं की सम्पूर्ण रेंज प्रदान करने का प्रस्ताव है। ईपीआरआई में आधुनिकता औरकार्य कुशलता के प्रतीक के रूप में पीआरआई में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने और व्यापक आईसीटी (सूचना संचारप्रविधि) संस्कृति को प्रेरित करने की क्षमता है।
ईपीआरआई में सभी 2.36 लाख पंचायतों को तीन वर्ष के लिए 4500 करोड़ रुपए के अनन्तिम लागत सेकम्प्यूटरिंग सुविधाएं मय कनेक्टिविटी (सम्पर्क सुविधाओं सहित) के प्रदान करने की योजना है। चूंकि पंचायतें, केन्द्र राज्यों के कार्यक्रमों की योजना तैयार करने तथा उनके क्रियान्वयन की बुनियादी इकाइयां होती हैं, ईपीआरआई, एक प्रकार से, एमएमपी की छत्रछाया के रूप में काम करेगा। अतः सरकार, ईएनईजीपी के अन्तर्गतईपीआरआई को उच्च प्राथमिकता देगी। देश के प्रायः सभी राज्यों (27 राज्यों) की सूचना और सेवाआवश्यकताओं का आकलन, व्यापार प्रक्रिया अभियांत्रिकी और विस्तृत बजट रिपोर्ट पहले ही तैयार की जा चुकीहैं और परियोजना पर अब काम शुरू होने को ही है।

महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण
राष्ट्रपति ने 4 जून, 2009 को संसद में अपने अभिभाषण में कहा था कि वर्ग, जाति और लिंग के आधार पर अनेकप्रकार की वर्जनाओं से पीड़ित महिलाओं को पंचायतों में 50 प्रतिशत आरक्षण के फैसले से अधिक महिलाओं कोसार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश का अवसर प्राप्त होगा। तद्नुसार मंत्रिमंडल ने 27 अगस्त, 2009 को संविधान की धारा को संशोधित करने के प्रस्ताव का अनुमोदन कर दिया ताकि पंचायत के तीनों स्तर की सीटों और अध्यक्षोंके 50 प्रतिशत पद महिलाओं के लिए आरक्षित किये जा सकें। पंचायती राज मंत्री ने 26 नवम्बर, 2009 कोलोकसभा में संविधान (एक सौ दसवां) सशोधन विधेयक, 2009 पेश किया।

243 वर्तमान में, लगभग 28.18 लाख निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों में से 36.87 प्रतिशत महिलायें हैं। प्रस्तावितसंविधान संशोधन के बाद निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की संख्या 14 लाख से भी अधिक हो जाने की आशा है।

पंचायती राज संस्थाओं को कार्यों, विभाग और पदाधिकारियों का हस्तान्तरण
पंचायतें जमीनी स्तर की लोकतांत्रिक संस्थायें हैं और कार्यों, विभाग तथा पदाधिकारियों के प्रभावी हस्तांतरण सेउन्हें और अधिक सशक्त बनाए जाने की आवश्यकता है। इससे पंचायतों द्वारा समग्र योजना बनाई जा सकेगी औरसंसाधनों को एक साथ जुटाकर तमाम योजनाओं को एक ही बिन्दु से क्रियान्वित किया जा सकेगा।

ग्राम सभा का वर्ष
पंचायती राज के 50 वर्ष पूरे होने पर 2 अक्तूबर, 2009 को समारोह का आयोजन किया गया। स्वशासन में ग्रामसभाओं और ग्राम पंचायतों में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के महत्व को देखते हुए 2 अक्तूबर, 2009 से 2 अक्तूबर, 2010 तक की अवधि को ग्राम सभा वर्ष के रूप में मनाया जाएगा। ग्राम सभाओं की कार्य प्रणाली मेंप्राथमिकता सुनिश्चित करने के सभी संभव प्रयासों के अतिरिक्त, निम्नलिखित कदम उठाए जा रहे हैं--पंचायतों, विशेषतः ग्राम सभाओं के सशक्तीकरण के लिए आवश्यक नीतिगत, वैधानिक और कार्यक्रम परिवर्तन, पंचायतों मेंअधिक कार्य कुशलता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु सुव्यवस्थित प्रणालियों और प्रक्रियाओं कोऔर ग्राम सभाओं तथा पंचायतों की विशिष्ट गतिविधियों को आकार देना और ग्राम सभाओं तथा पंचायतों कीविशिष्ट गतिविधियों के बारे में जन-जागृति फैलाना।

न्याय पंचायत विधेयक, 2010
वर्तमान न्याय प्रणाली, व्ययसाध्य, लम्बी चलने वाली प्रक्रियाओं से लदी हुई, तकनीकी और मुश्किल से समझ मेंआने वाली है, जिससे निर्धन लोग अपनी शिकायतों के निवारण के लिए कानूनी प्रक्रिया का सहारा नहीं ले पाते।इस प्रकार की दिक्कतों को दूर करने के लिए मंत्रालय ने न्याय पंचायत विधेयक लाने का प्रस्ताव किया है।प्रस्तावित न्याय पंचायतें न्याय की अधिक जनोन्मुखी और सहभागिय प्रणाली सुनिश्चित करेंगी, जिनमेंमध्यस्थता, मेल-मिलाप और समझौते की अधिक गुंजाइश होगी। भौगौलिक और मनोवैज्ञानिक रूप से लोगों केअधिक नजदीक होने के कारण न्याय पंचायतें एक आदर्श मंच संस्थायें साबित होंगी, जिससे दोनों पक्षों औरगवाहों के समय की बचत होनी, परेशानियां कम होंगी और खर्च भी कम होगा। इससे न्यायपालिका पर काम काबोझ भी कम होगा।

पंचायत महिलाशक्ति अभियान
यह निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों (ईडब्ल्यूआर) के आत्मविश्वास और क्षमता को बढाऩे की योजना है ताकि वे उनसंस्थागत, समाज संबंधी और राजनीतिक दबावों से ऊपर उठकर काम कर सकें, जो उन्हें ग्रामीण स्थानीयस्वशासन में सक्रियता से भाग लेने में रोकते हैं। बाइस राज्यों में कोर (मुख्य) समितियां गठित की जा चुकी हैं औरराज्य स्तरीय सम्मेलन हो चुके हैं। योजना के तहत 9 राज्य समर्थन केन्द्रों की स्थापना की जा चुकी है। ये राज्यहैं-- आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ , हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, सिक्किम, केरल, पश्चिम बंगाल और अंडमान एवंनिकोबार द्वीप समूह। योजना के तहत 11 राज्यों में प्रशिक्षण के महत्त्व के बारे में जागरूकता लाने के कार्यक्रम होचुके हैं। ये राज्य हैं-- आंध्र प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, ग़ोवा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, मणिपुर, केरल, असम, सिक्किम और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह।

सभागीय स्तर के 47 सम्मेलन 11 राज्यों (छत्तीसगढ़, ग़ोवा, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, सिक्किम, मणिपुर, उत्तराखंड , पश्चिम बंगाल और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह) में आयोजित किए गए हैं।गोवा और सिक्किम में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों और निर्वाचित युवा प्रतिनिधियों (ईडब्ल्यूआर्स ईवाईआर्स) के राज्य स्तरीय संघ गठित किये जा चुके हैं।

ग्रामीण व्यापार केन्द्र (आरबीएच) योजना
भारत में तेजी से हो रहे आर्थिक विकास को ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से पहुंचाने के लिएमें आरबीएच योजना शुरू की गई थी। आरबीएच, देश के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विकास का एक ऐसासहभागिय प्रादर्श है जो फोर पी अर्थात पब्लिक प्राईवेट पंचायत पार्टनरशिप (सरकार, निजी क्षेत्र, पंचायतभागीदारी) के आधार पर निर्मित है। आरबीएच की इस पहल का उद्देश्य आजीविका के साधनों में वृद्धि के अलावाग्रामीण गैर-कृषि आमदनी बढाक़र और ग्रामीण रोजगार को बढाव़ा देकर ग्रामीण समृद्धि का संवर्धन करना है।

2007 राज्य सरकारों के परामर्श से आरबीएच के अमल पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित करने के लिए 35 जिलों काचयन किया गया है। संभावित आरबीएच की पहचान और उनके विकास के लिए पंचायतों की मदद के वास्ते गेटवेएजेन्सी के रूप में काम करने हेतु प्रतिष्ठित संगठनों की सेवाओं को सूचीबद्ध किया गया है। आरबीएच की स्थापनाके लिए 49 परियोजनाओं को विभागीय सहायता दी जा चुकी है। भविष्य में उनका स्तर और ऊंचा उठाने के लिएआरबीएच का मूल्यांकन भी किया जा रहा है। (पसूका)

आज से सभी बच्चों को मिलेगा शिक्षा का हक....

आज देश के उन बच्चों के लिए खुशी का दिन है जो किसी भी कारण से स्कूल जाने से छूट जाते हैं. आज से भारत में 6-14 साल के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा का क़ानून लागू हो जायेगा. नि:शुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 एक अप्रैल से प्रदेश में लागू होने जा रहा है। अधिनियम के प्रावधानों के तहत 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों का शत-प्रतिशत नामांकन, उपस्थिति तथा बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण कराने की संवैधानिक अनिवार्यता का निर्वहन राज्य सरकार तथा स्थानीय निकाय करेंगे। उन्होंने बताया कि एक्ट निर्धारित मापदण्डों के तहत जितने शिक्षकों की आवश्यकता होगी, उसकी पूर्ति छह माह के भीतर कर ली जायेगी। इसके लिये रोडमैप भी बनाया गया है।


संविधान के अनुच्छेद 45 में 6-14 वर्ष के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा देने की बात है,

2002 में 86 वें संविधान संशोधन ऐसा शिक्षा के अधिकार की बात कही गयी है.

2009 में शिक्षा के अधिकार के अधिकार का बिल पास हुआ

अब 01 अप्रेल से ये देश के सारे स्कूलों में लागू होगा.


खासियत

6 से 14 वर्ष के बच्चों हेतु नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा

प्रवेश, उपस्थिति एवं प्रारंभिक शिक्षा की अनिवार्य पूर्णता सुनिश्चित करना

पूरे साल में कभी भी बच्चों को प्रवेश दिया जायेगा

स्कूल जन्म प्रमाण पत्र, स्थानांतर प्रमाणपत्र आदि दस्तावेजों के होने पर भी स्कूल देंगे.

अनामांकित एवं शाला से बाहर बच्चों के लिए विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था

किसी भी बच्चे को कक्षा 8 तक फेल करने पर प्रतिबंध

बच्चों को शारीरिक दण्ड देने एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित करना पूर्णत: प्रतिबंधित

बच्चों के लिए उनके निर्धारित पड़ोस में शिक्षा की सुविधा 3 वर्ष में उपलब्ध कराने की बाध्यता

नियम, मापदण्ड के अनुरूप 3 वर्ष में प्रत्येक शाला में राज्य सरकार स्कूलों में आधारभूत संरचना जैसे भवन, खेल मैदान, लाइब्रेरी आदि जैसी जरूरी चीजें उपलब्ध कराएगी.

शिक्षक-छात्र अनुपात अनुरूप शिक्षकों की व्यवस्था 6 माह में

अच्छी गुणवत्ता की प्रारंभिक शिक्षा

शिक्षकों का गैर शिक्षकीय कार्य में लगाना प्रतिबंधित। (दशकीय जनगणना, चुनाव एवं आपदा राहत को छोड़कर)

शाला विकास योजना निर्माण, प्रबंधन, मॉनीटरिंग का कार्य स्थानीय निकाय के सहयोग से शाला प्रबंधन समिति द्वारा

निजी स्कूलों में केपिटेशन फीस एवं प्रवेश के लिए स्क्रीनिंग प्रतिबंधित,

गैर अनुदान प्राप्त शालाओं के लिए अपने पड़ोस के न्यूनतम 25 प्रतिशत बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा प्रदाय करना अनिवार्य

प्रति छात्र व्यय अथवा गैर अनुदान प्राप्त शाला की वास्तविक फीस जो भी कम हो के आधार पर राज्य द्वारा फीस की प्रतिपूर्ति

बिना मान्यता के किसी भी स्कूल का संचालन नहीं

प्रत्येक शाला हेतु न्यूनतम कार्य दिवस एवं शिक्षण के घंटे निर्धारित


प्रदेश की स्कूल शिक्षा मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनीस ने कहा है

इसके तहत अनामांकित एवं शाला से बाहर बच्चों के लिये विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था की जायेगी। किसी भी बच्चे को कक्षा आठवीं तक फेल करने पर प्रतिबंध रहेगा। बच्चों को शारीरिक दण्ड देने एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित करना भी पूर्णत: प्रतिबंधित रहेगा। समस्त बच्चों के लिये उनके निर्धारित पड़ोस में शिक्षा की सुविधा तीन वर्ष में उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी राज्य सरकार तथा स्थानीय निकायों को सौंपी गई है। नियत मापदण्ड के अनुरूप प्रत्येक शाला में अधोसंरचना की व्यवस्था तीन वर्ष में तथा शिक्षक छात्र अनुपात के अनुरूप शिक्षकों की व्यवस्था के लिये छह माह का समय निर्धारित किया गया है।

साथ ही प्रदेश में एक्ट को लागू कराने के अलावा उसके सफल क्रियान्वयन हेतु अच्छी गुणवत्ता की प्रारंभिक शिक्षा उपलब्ध कराना होगी। शिक्षकों का गैर शिक्षकीय कार्य में लगाना प्रतिबंधित कर दिया गया है। यह प्रतिबंध दशकीय जनगणना, चुनाव एवं आपदा राहत को छोड़कर लागू रहेगा। शाला विकास विकास योजना, निर्माण, प्रबंधन, मानीटरिंग का कार्य स्थानीय निकाय के सहयोग से शाला प्रबंधन समिति द्वारा किया जायेगा। निजी स्कूलों में केपिटेशन फीस एवं प्रवेश के लिये स्क्रीनिंग अब पूर्णत: प्रतिबंधित रहेगी। गैर अनुदान प्राप्त शालाओं को अपने पड़ोस के न्यूनतम 25 प्रतिशत बच्चों को निशुल्क शिक्षा देना अनिवार्य होगा। राज्य द्वारा किया जा रहा प्रति छात्र व्यय अथवा गैर अनुदान प्राप्त शाला की वास्तविक फीस जो भी कम हो के आधार पर राज्य द्वारा फीस की प्रतिपूर्ति की जायेगी। अब बिना मान्यता के किसी भी स्कूल का संचालन नहीं किया जा सकेगा। प्रत्येक शाला हेतु न्यूनतम कार्य दिवस एवं पढ़ाने के घण्टे निर्धारित रहेंगे।


शिक्षा का अधिकार और हमारी भूमिका

महिलाओं और बच्चियों को साक्षर कर सशक्त बनाना तेजस्विनी कार्यकरण के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है, इस अभियान को कार्यक्रम के छह जिलों में सफल बनाने हम महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं -

शिक्षा की अनिवार्यता का प्रचार प्रसार करें

कार्यक्रम के अंतर्गत स्वसहायता समूह सदस्यों को साक्षर करने अभियान चलाया जा रहा है सदस्यों को इस हेतू जागरूक करें की वे स्वयं भी शिक्षित हों और अपने बच्चों को भी अनिवार्य रूप से स्कूल भेजें.

स्वसहायता समूह ग्रामों में स्कूल चलो अभियान भी प्रारंभ कर सकते है, तेजस्विनी के कुछ समूहों ने पहले इस तरह के अभियान चलाये है जिनके परिणाम सार्थक रहे हैं.

लोकेशन स्टाफ मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा क़ानून के प्रावधानों को भली भाँती समझ लें और सभी समूह बैठकों में इस क़ानून के सभी

पहलुओं पर चर्चा करें ताकि महिलाओं में जागरूकता के साथ जानकारी का भी प्रवाह हो.

राज्य सरकार द्वारा दो अप्रैल को शिक्षा चौपाल और चौदह अप्रैल को ग्राम सभा के साथ शिक्षा सभा का आयोजन किया गया है, स्वसहायता

समूहों को प्रेरित करें की वे इन विशेष सभाओं में आवश्य रूप से भाग लें.

लोकेशन स्टाफ और स्वसहायता समूह मिलकर इस हेतु प्रयास कर सकते हैं की कुल 2779 ग्रामों के 180000 स्वसहायता

समूह परिवारों के साथ ग्राम का कोई भी बच्चा स्कूल शिक्षा से अछूता रहे.

समस्त अशासकीय संगठन इस हेतु अपनी रणनीति भी बनाकर स्वसहायता समूहों को मदद कर सकते हैं.

संजीव परसाई, संचार अधिकारी