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चने की दो नई किस्में

सब्जी के रूप में अगैती फसल के हर चने की सप्लाई मुख्य रूप से दक्षिणी राज्यों से ही होती है। हैदराबाद के अंतरराष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान ने दो नई किस्में विकसित की हैं जिनकी बुवाई उत्तरी राज्यों में अगैती फसल के रूप में हो सकती है।
देश में चने खासकर हरे चने (छोलिया) की फसल पहले दक्षिणी राज्यों से आती है। उत्तरी राज्यों की हर चने की फसल इसके बाद ही बाजार में पहुंच पाती है। गौरतलब है कि ज्यादातर अगैती चने की खपत छोलिया (हर चने) के रूप में ही जाती है। मुख्य फसल और पछैती फसल का चना सुखाया जाता है और काले (सूखे) चने के रूप में वर्षभर इस्तेमाल होता है। इस तरह अभी बाजार में सब्जी के रूप में हर चने की अभी मुख्य रूप से दक्षिणी राज्यों का ही बिकता है।
अगैती फसल होने के कारण दक्षिणी राज्यों के किसान बेहतर मूल्य पाने में सफल हो जाते हैं लेकिन उत्तरी राज्यों के किसानों की फसल बाजार में जब पहुंचती है, तब सप्लाई पूर जोरों पर शुरू हो चुकी होती थी। इस वजह से चने के मूल्य काफी गिर चुके होते हैं। हैदराबाद स्थित अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के अंतरराष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान (आईसीआरआईएसएटी) ने चने की दो अगेती किस्में आईसीसीवी-96029 और आईसीसीवीवी-96030 विकसित की हैं। ये किस्में उत्तरी राज्यों की जलवायु के लिए अनुकूल हैं। इन किस्मों की बुवाई करके उत्तरी राज्यों के किसान भी अगैती बुवाई करके चने की जल्दी पैदावार कर सकते हैं।
अगैती फसल वाले चने की खपत उस समय भी खूब रहती है जब वह सूखने से पहले हरा होता है। सब्जी के रूप में इसका उपयोग किया जाता है। हर दानों में अमीनो अम्लों खनिज लवणों की अधिक मात्रा पायी जाती है। इसके अलावा हरा चना (छोलिया) फलीदार फसल होने के कारण वातावरण की नाइट्रोजन का भूमि में स्थिरीकरण कर जमीन को उपजाऊ बनाने में भी सहायक है। छोलिया की खेती कम वर्षा और विपरीत परिस्थितियों वाली जलवायु में आसानी से की जा सकती है। चने की अपेक्षा छोलिया की फसल में कटुआ कीट का भी कम प्रकोप होता है। इसकी फसल से प्राप्त हरा चारा भी पशुओं के लिए स्वादिष्ट, पौष्टिक और ताकतवर है।
छोलिया की मांग दिसंबर और जनवरी में सबसे अधिक रहती है, लेकिन इस दौरान उत्तर भारत के राज्यों में छोलिया की सप्लाई नहींे होती है। ऐसे में छोलिया की नई किस्में अगेती होने के कारण किसानों के लिए काफी फायदेमंद है। इस समय किसान छोलिया को बेचकर अधिक लाभ कमा सकते है। हालांकि इस दौरान दक्षिण भारत में छोलिया की उपलब्धता की कोई समस्या नहीं है। इसकी बुवाई उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में खरीफ की विभिन्न फसलों जैसे अगेती धान, मक्का, मूंग, उड़द और सोयाबीन की कटाई के बाद कर सकते हैं।
नए किस्मों की उपज
आईसीसीवी-96029 किस्म के हर चने की औसत उपज करीब नौ टन प्रति हैक्टेयर और आईसीसीवी -96030 की पैदावार करीब सात टन प्रति हैक्टेयर रहती है। इस तरह आईसीसीवी-96029 की कुल पैदावार पुरानी किस्म आईसीसीवी के मुकाबले करीब 30 फीसदी अधिक है। इसके पौधों की ऊंचाई, शाखाएं, प्रति पौधा फलियों की संख्या और 1,000 हर दानों का भार भी आईसीसीवी-30 की तुलना में अधिक है।

बुवाई का समय
दोनों किस्मों की बुवाई 30 सितंबर से लेकर 15 अक्टूबर बीच कर देनी चाहिए। बुवाई के 35 दिन बाद पहली सिंचाई और 80 दिन बाद दूसरी सिंचाई करनी चाहिए। छोलिया की खेती में फास्फोरस की मात्रा करीब 40 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर को सिंगल सुपर फास्फेट के रूप में बुवाई के समय करनी चाहिए। इसके अलावा फसल में नाइट्रोजन की एक समान मात्रा 20 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर के हिसाब से डालनी चाहिए।
- रामवीर सिंह

बिजिनेस भास्कर से

निरक्षर भी सीख सकते हैं कम्प्यूटर

जो लोग पढ़ नहीं पाते अब वो भी कंप्यूटर को समझ सकते हैं। ऐसा संभव हो पाया है नए टेक्स्ट-फ्री यूजर इंटरफेस से। इस इंटरफेस को माइक्रोसेफ्ट रिसर्च इंडिया की महिला एसोसिएट रिसर्चर ने विकसित किया है। इस इंटरफेस के जरिए कोई भी बिना पढ़ा-लिखा व्यक्ति कंप्यूटर को आसानी से समझ सकता है।

इंद्राणी मेधी ने इस इंटरफेस को विकसित किया। उन्होंने बताया कि इसकी डिजाइन के लिए 400 से अधिक विषयों को शामिल किया गया। इसे बनाने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। खास-तौर पर भारत में फैली कई लो-इनकम और लो-ल्रिटेसी कम्युनिटी के लिए यूजर इंटरफेस को बनाने में कई दिक्कतें आईं। उन्होंने कहा कि नॉन-टेक्सचुअल यूजर इंटरफेस बनाने के लिए बिना टेक्स्ट के समझाना काफी चुनौतीभरा था। इसके लिए वॉयस, वीडियो और ग्राफिक्स के कांबिनेशन का प्रयोग किया गया। मेधी के इस अप्लीकेशन में बातों को समझाने के लिए कुछ प्रिसिंपल का प्रयोग किया गया। इनमें हाथ से बनी आकृतियां, काटरून, क्षेत्रीय भाषाओं की आवाज, माउस का ज्यादा प्रयोग, फीचर और वीडियो मुख्य रूप से शामिल हैं।

इनके जरिए लोगों को आसानी से कंप्यूटर से इंटरैक्ट कराया जा सकता है। वो भी ऐसे लोग जिन्हें पढ़ना नहीं आता है।मेधी की यह खोज चार अप्लीकेशस पर अप्लाई होंगे। लेबर बाजार में जॉब सर्च, हेल्थ इन्फॉर्मेशन, मोबाइल मनी-ट्रांसफर और इलेक्ट्रॉनिक मैप के लिए। माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च इंडिया के पूर्व असिस्टेंट मैनेजिंग डायरक्टर केंतारो टोयामा ने कहा कि मेधी ने इस खोज के लिए काफी मेहनत की है। उन्होंने कहा कि निरक्षर लोगों को समझ में आने वाले कंप्यूटिंग डिवाइस के लिए यूजर इंटरफेस बनाने पर काफी रिसर्च किया गया है। यहां तक अगर कोई पहली बार कंप्यूटर को चलाने बैठा है तो भी यह डिवाइस बड़े काम की साबित हो सकती है।

टोयामा ने बताया कि मेधा ने लोगों की जरूरत को समझने के लिए काफी समय झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों के साथ व्यतीत किया। उस दौरान उन्होंने उनकी रोजमर्रा की जरूरतों के बार में समझा। टोयामा के मुताबिक मेधा ने ऐसा डिवाइस तैयार किया है जो आसानी से समझ में आने वाला है, क्योंकि इसमें आकृतियों और वॉयस का अच्छा समावेश है।

यहीं नहीं, उन्होंने इसमें आसानी से समझाने के लिए फोटो की जगह ज्यादातक काटरून का प्रयोग किया है। साथ में साधारण आकृतियों और नंबरों का भी यूज हुआ है। इससे निरक्षर लोग आसानी से बात समझ पाएंगे। मेधा की इस खोज से निरक्षर लोगों के मन में बैठा डर दूर होगा। डर तकनीकी का, डर तकनीक को खराब करने का और डर उसे सीखने का। इससे ऐसे लोगों का मनोबल भी बढ़ेगा। इस डिवाइस में मेधी ने त्नफुल-कांटेक्स्ट वीडियोत्न का प्रयोग किया है। कई कहानियां भी दी गई है। ऐसी कहानियां जो समझाएं कि तकनीकी कैसे काम करती है। खास बात यह कि यह कहानियां लोगों के आम-जीवन से जुड़ी हुई हैं। मेधी अब काफी कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए यूजर इंटरफेस तैयार करने के लिए रिसर्च कर रही हैं।

(बिजिनेस भास्कर से)

दूध दूध दूध – दूध है वंडरफुल....

दूध की देश में काफी मांग हैं और भारत दूध उत्पादन के क्षेत्र में विश्व में पहलेनंबर पर है। लेकिन तरल दूध को लंबे समय तक भंडारित करके नहीं रखा जासकता है। इसी कारण दूध को अधिक समय तक सुरक्षित रखने के विभिन्नउपाय किए जा रहे हैं, जिसमें दूध को पाउडर बनाने की प्रौद्योगिकी काफीलोकप्रिय है। अधिक समय तक सुरक्षित रखने और कई उत्पादों में उपयोग केकारण दूध पाउडर की देश में काफी मांग है। इसके अलावा दूध को पाउडर केरूप में अधिक समय तक एवं अधिक मात्रा में भंडारित किया जा सकता है। इसका आसानी से परिवहन भी कियाजा सकता है।

दूध पाउडर बनाने की विधियां
दूध का पाउडर आमतौर पर दो प्रकार से तैयार किया जाता है। स्प्रे-ड्राइड प्रक्रिया द्वारा और रोलर ड्राइड प्रक्रिया सेदूध का पाउडर तैयार किया जाता है। स्प्रे-ड्राइड प्रक्रिया में काफी भारी निवेश और काफी बड़े स्थान की आवश्यकताहोती है। अधिकतर बड़े दूध के संयंत्रों में स्प्रे ड्राइड प्रक्रिया द्वारा ही अतिरिक्त दूध को पाउडर में परिवर्तित कियाजाता है और जब तरल दूध की मात्रा कम होती है, तो पाउडर को दूध में बदलकर बाजार में बेचा जाता है। स्प्रे ड्राइडप्रक्रिया से तैयार किया गया दूध पाउडर काफी अच्छी गुणवत्ता वाला होता है, इसीलिए बाजार में बेचे जाने वाले दूधमें, बच्चों के दूध पाउडर आदि में स्प्रे ड्राइड प्रक्रिया से तैयार दूध पाउडर ही उपयोग में लाया जाता है।

छोटे स्तर पर रोलर ड्राइड प्रक्रिया द्वारा दूध पाउडर तैयार किया जाता है। इस प्रक्रिया से तैयार दूध पाउडर थोड़ामोटे दानों वाला होता है और इसका उपयोग बेकरी, गुलाब जामुन मिक्स और अन्य पकवानों में होता है। रोलरड्राइड प्रक्रिया में लागत काफी कम आती है और इसके लिए काफी कम स्थान की आवश्यकता होती है। यहां रोलरप्रक्रिया द्वारा दूध पाउडर तैयार करने की विधि और इसके उत्पादों के बार मंे बताया जा रहा है।

रोलर ड्राइड प्रक्रिया स्थापित करने की लागत
रोलर ड्राइड प्रक्रिया के लिए दो लोहे के बड़े सलेंडर होतें हैं, जिन्हे बराबर लिटाकर मोटर लगी मशीन पर स्थापितकिया जाता हैं। यह रोलर करीब 15 से 19 चक्र प्रति मिनट की गति से घूमता है और इन सिलेंडरों में भाप मौजूदरहती है। रोलर संयंत्र स्थापित करने के लिए आवश्कता के मुताबिक छोटा बॉयलर, दूध को उबालने के लिए बड़ीकड़ाही, स्टील पाइप, मिल्क पंप, रोलर को घूमाने के लिए मोटर और पैकिंग सामग्री की जरूरत होती है।

उत्तर प्रदेश में स्थित मिल्क टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक और राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल से प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके कामरान सिद्दीकी ने हमें बताया कि 1,000 लीटर की क्षमता वाले बॉयलर काखर्च करीब 8 लाख रुपये आता है, इसमें रोलर से जुड़ी सभी पाइप भी शामिल हैं, इसके अलावा रोलर ड्रम पर करीबलाख रुपये का खर्च आता है और इन्हे कास्ट आइरन से तैयार किया जाता है। सिद्दिकी का कहना है कि पानी कीटंकी कम से कम 10,000 लीटर क्षमता की होनी चाहिए, क्योंकि दूध के काम में साफ-सफाई बेहद महत्वपूर्णहोती है। पंप, मोटर को मिलाकर रोलर ड्राइड दूध पाउडर के संयंत्र पर कुल लागत करीब 15 लाख रुपये तक आतीहै। सिद्दीकी का कहना है कि उनकी कंपनी रोलर ड्राइड पाउडर तैयार करने के साथ ही उसके उत्पाद जैसेगुलाबजामुन मिक्स, बिस्कुट आदि भी तैयार करती है।

रोलर ड्रम से दूध पाउडर बनाने की प्रक्रिया
आमतौर पर क्रीम निकाले गए दूध यानि स्किम्ड (सप्रेटा) दूध से पाउडर तैयार किया जाता है। प्रक्रिया में सबसेपहले दूध को उबालकर गाढ़ा कर लेते हैं। इसके बाद सिलेंडर में भाप छोड़कर इनका तापमान करीब 150 डिग्रीसेंटीग्रेड तक लाया जाता है। दोनों सिलेंडर विपरीत दिशाओं में घूमते रहते हैं और इन पर बूंद-बूंद करके दूधटपकाया जाता है। ड्रम के गर्म होने के कारण दूध में मौजूद पानी तुरंत भाप बनकर उड़ जाता है और सूखा पाउडरड्रम पर चिपक जाता है। -अनुराग शर्मा बिजिनेस भास्कर से साभार...

कारपोरेट घरानों को चुनौती देता एक देसी उद्यम - लिज्जत पापड़

-विपिन दिवासर
एक कहावत है कि ‘सौ मील का सफर पहले कदम से शुरू होता है।’ इस कहावत को श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ ने चरितार्थ करके दिखाया है जो शून्य से शुरू होकर आज शिखर तक पहुंच गया है। मात्र 80 रूपए के कर्ज की राशि से की गई शुरुआत वर्तमान समय में 301 करोड़ रूपए प्रतिवर्ष की बिक्री तक पहुंच गई है।
मुंबई के गिरगांव में रहने वाली सात महिलाओं द्वारा पापड़ बनाने की पहल आज पूरे देश में लघु उद्योगों की सफलता का एक ज्वलंत उदाहरण है जो पिछले 40 वर्षों से उत्पादन की गुणवत्ता को आधार मानते हुए आगे बढ़ रहा है। लिज्जत पापड़ समूह ने देश में लघु उद्योग के चरमोत्कर्ष का एक उदाहरण पेश किया है। हालांकि भारत के विभिन्न हिस्सों में रहने वाली इस समूह की महिलाएं अपने स्तर पर पापड़ बनाती हैं, फिर भी लिज्जत पापड़ ने इसे एक उद्योग बनाकर विश्वस्तर तक पहुंचा दिया है। इस की शुरूआत देश के औद्योगिक राज्य मुंबई के गिरगांव से हुई। मात्र 80 रूपए का कर्ज लेकर गिरगांव की सात महिलाओं ने अपने स्तर पर पापड़ बनाने का कार्य शुरू किया। ये महिलाएं इस काम के लिए प्रशिक्षित नहीं थी, परंतु उनके अंदर एक अद्भुत दृढ़ता थी। उन्होंने अपने सामान्य गुणों को विकसित किया और यही उनका हथियार बन गया। उन्होंने अपने घरों की छतों को मुख्य कारखाना बनाया। वही पहल आज चालीस वर्षों का लंबा सफर तय कर विश्वस्तर तक पहुंच गई है। वर्तमान में इस समूह की अधयक्ष ज्योति नाइक हैं जो आज भी लिज्जत पापड़ के चालीस वर्ष पहले निर्धारित किए गए सिद्धांतों पर चलकर इसके विकास में जुटी हुई हैं। लेकिन इस लंबे अंतराल में समूह का स्वरूप काफी बदल गया है।
अब लिज्जत समूह के उत्पादों का उत्पादन मुंबई की मात्र सात छतों पर न होकर देश के कई हिस्सों में होता है। कोई भी सामान्य महिला इस समूह की सदस्य बन सकती है। इसके लिए इच्छुक महिला के आवास का निरीक्षण किया जाता है। फिर उसे उत्पादन की प्रक्रिया से अवगत कराया जाता है। लिज्जत पापड़ के उत्पादन में मुख्य रूप से आटा गूंदना, लोई बनाना, पापड़ बनाना, सुखाना तथा पैंकिग की प्रक्रियाएं हैं। इन कार्यों को महिलाओं की क्षमतानुसार बांट दिया जाता है। अभी तक समूह की मुंबई में 12 हजार, शेष महाराष्ट्र में 22 हजार तथा गुजरात में करीब 7 हजार सदस्य हैं। यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। यह एक रोचक तथ्य है कि आधुनिकीकरण के इस दौर में भी लिज्जत समूह ने मशीनीकरण का सहारा नहीं लिया है। यही वजह है कि यह समूह आज देश के हजारों घरों को रोजगार दे रहा है।
लिज्जत पापड़ समूह की महिलाओं द्वारा आटा गूंधने, लोई बनाने, पापड़ बनाने, सुखाने तथा पैंकिग कर देने के बाद इसके वितरण की जिम्मेदारी वितरकों की होती है। समूह द्वारा चयनित वितरक को एक लाख पचास हजार रूपए की राशि बतौर गारंटी जमा करनी होती है। साथ ही समूह द्वारा वितरक की जगह व गोदाम आदि का मुआयना किया जाता है ताकि उत्पाद को वितरित करने की किसी भी प्रक्रिया में लापरवाही न हो सके। समूह के अभी तक मुंबई में 32 वितरक हैं जो रोजाना करीब 100 डब्बों (एक डिब्बे में 13.6 कि.ग्रा. पापड़ होता है) को आम आदमी तक पहुंचाते हैं। इसके लिए ये थ्री व्हीलर तथा अपने सेल्समेनों का सहारा लेते हैं। कुछ इसी प्रकार की प्रक्रिया लिज्जत पापड़ द्वारा अपने उत्पाद को निर्यात करने में भी अपनाई जाती है। समूह के उत्पाद मुख्यत: अमेरिका, ब्रिटेन सिंगापुर, हांगकांग, हालैंड तथा मध्यपूर्वी देशों में निर्यात किए जाते हैं। इससे समूह को लगभग 10 करोड़ रूपए की आय प्राप्त होती है। यह समूह की आमदनी का 30 से 35 प्रतिशत होता है।
लिज्जत पापड़ समूह द्वारा शून्य से शिखर तक पहुंचने के सफर का मूल राज इसकी शक्तियों के विकेन्द्रीकरण में है। हरेक केंद्र की देखरेख करने के लिए संचालिका या सुपरवाइजर नियुक्त है लेकिन संस्था की कार्यप्रणाली कुछ ऐसी है कि प्रत्येक सदस्य अपने स्तर पर पहल कर सकता है, निर्णय ले सकता है। साथ ही प्रत्येक सदस्य को वीटो पावर होता है। सभी निर्णय हमेशा सर्वानुमति से ही लिए जाते हैं। एक सदस्य की आपत्ति से भी प्रस्ताव निरस्त हो सकता है।
इसी प्रकार उत्पादन भी किसी एक केंद्रीय स्थान पर न होकर सैकड़ों-हजारों घरो में होता है। उत्पाद और उसके पैकिंग की गुणवत्ता के निरिक्षण की व्यवस्था भी हरेक केंद्र पर होती है। इस प्रकार उत्पादन से लेकर उसकी पैकिंग, संग्रह तथा वितरण और लाभ तक की जिम्मेदारी शाखा केंद्र की ही होती है। इसके लिए कोई केंद्रीकृत व्यवस्था नहीं बनाई गई है। इस प्रकार प्रबंधन समस्याओं का समाधान करने की बजाय उन समस्याओं को उतना ही नहीं होने दिया गया है।
विकेंद्रीकरण की इन व्यवस्थाओं के बाद भी कुछ व्यवस्थाएं केंद्रीय स्तर पर की जाती हैं। जैसे, कच्चा माल (चावल, उड़द, मसाले आदि) मुंबई में खरीदे जाते हैं। फिर उनकी पिसाई के लिए समूह की अपनी दो मिलें हैं। एक नवी मुंबई के वाशी में और दूसरी नासिक में। इसके पीछे उनका तर्क है कि अलग-अलग स्थानों पर चावल-दाल आदि की गुणवत्ता अलग-अलग होती है, स्थानीय स्तर पर कच्चा माल खरीदने पर उत्पाद की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है। और चूंकि सारा कच्चा माल मुंबई में खरीदा जाता है, इसलिए अपनी मित्रों में पिसवाना सस्ता होता है। इसी प्रकार उत्पाद की कीमत भी एक ही स्थान से तय की जाती है। इसलिए भारत भर में लिज्जत पापड़ 16.25 रूपए प्रति किलो ही बिकता है। लिज्जत पापड़ समूह की दूसरी शक्ति है लोगों को महत्व देना।
समूह अपनी प्रत्येक सदस्य जो कि अनिवार्यत: महिला ही होती है, को काफी महत्व देता है। महिलाओं के पारिवारिक दायित्वों और समय व समाज के दबावों को वह उनकी कमी नहीं, बल्कि एक शक्ति मानता है। इसलिए लिज्जत ने आज घर में रहकर काम करने की इच्छा रखने वाली महिलाओं को काफी प्रोत्साहित किया है। लोगों को महत्व देने और उनकी समस्याओं को समझने के गुण के कारण लिज्जत आज एक मजबूत और स्थिर व्यावसायिक प्रारूप बन सका है। लोगों के महत्व और स्वावलंबन के अपने मुख्य उद्देश्य के कारण ही विकास और यांत्रिकीकरण के वर्तमान दोह में भी लिज्जत पापड़ उत्पादन के लिए यंत्रों का उपयोग नहीं करता। सभी सदस्यों को यहां एक समान भाव से देखा जाता है और इसीलिए कौन क्या काम कर रहा है या कौन कितना वरिष्ठ है, इस पर ध्यान दिए बिना लाभ भी सभी को समान रूप से बांटा जाता है। एक 21 सदस्यीय समिति यह तय करती है कि लाभ को किस रूप में बांटा जाए। सामान्यत: 5 या 10 ग्राम के सोने के सिक्के खरीद कर बांटे जाते हें। हरेक केंद्र पर लाभ की गणना की जाती है और उसे सदस्यों में बांटा जाता है।
लिज्जत पापड़ समूह की अधयक्ष ज्योति नाईक कहती हैं कि संस्था को बांधने वाली प्रमुख ताकत है आत्मगौरव और आत्मसम्मान का भाव। यह कोई गरीब और असहाय महिलाओं की संस्था नहीं है। लिज्जत पापड़ भी एक व्यवसाय है, केवल इसकी संरचना अलग है। इसमें किसी प्रकार की सहानुभूति, दया या दान की भावना नहीं है।

बुन्देली गुनिया घास दुग्ध उत्पादन के लिए फायदेमंद

लोगों की जीवन शैली बदलने के साथ खानपान की शैली भी बदल रही है। दूध और मीट के रूप में लोगों की प्रोटीन की मांग तेजी से बढ़ रही है। जबकि सूखी घास पलने वाले पशुओं से भारत में दूध और मीट कम मिल पाता है। यहाँ ऐसे पौष्टिक पशुचारे की जरूरत पैदा होती है जिससे पशुओं को दूध व मीट ज्यादा मिल सके। अभी हाल में गुनिया घास की एक नई प्रजाति तैयार की गई है। जिससे ज्यादा पैदावार हासिल की जा सकती है। इसमें प्रोटीन की मात्रा भी ज्यादा है। किसान इस हरे चारे की पैदावार करके न सिर्फ अपने पशुओं से ज्यादा दूध पा सकते है बल्कि खुले बाजार में भी इसकी बिक्री कर सकते है क्योंकि इसकी अच्छी मांग रहती है। भारत पशुधन और दुग्ध उत्पादन के मामले में दुनिया में पहले स्थान पर है। भारत में दुनियाभर का 15 फीसदी पशुधन मौजुद है। लेकिन प्रति पशु प्रोटीन ( दुग्ध व मीट के रूप में ) बहुत कम है। दरअसल भारत में पशुधन को पोषक तत्वों से भरपूर भोजन नहीं मिल पाता है। इसी कारण उनसे प्रोटीन प्राप्ति की दर काफी नीचे होती है। आज भी देश में ज्यादातर पशुओं को भोजन के नाम पर केवल सूखा भूसा ही खिलाया जाता है। जबकि दूधारू पशुओं के लिए हरे चारे की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है। हरे चारे के साथ पोषक भोजन खिलाने पर पशुओं की दूध देने की क्षमता बढ़ती है। देश के ज्यादातर पशुओं को आवश्यक पोषक तत्व भोजन नहीं मिल पाते है। जिसकी वजह से उनकी दूध देने की क्षमता सीमित ही रहती है। ज्ञात हो कि बेहतर प्रोटीन प्राप्ति के लिए जरूरी है कि पशुओं को पोषक तत्वों से भरपूर चारा खिलाया जाये। चुँकि अब प्रोटीन की मांग तेजी से बढ़ रही है इसलिए पशुपालक भी अब इस दौर से निकलने की कोशिश कर रहे हैं। पशुपालकों को पशुओं को खिलाने के लिए वाजिब दाम पर पोषक चारे की जरूरत है। इसीलिए पोषक तत्वों से भरपूर पशु चारे की मांग भी लगातार बढ़ती जा रही है। देश में लगभग करीब 12 लाख हैक्टेयर क्षेत्रफल में ही स्थाई चरागाह है। इन चरागाहों में पशुचारे की पैदावार बढ़ाने के लिए अब नई तकनीकों का प्रयोग किया जाना जरूरी हो गया है। ऐसा ही नया प्रयोग भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा किया गया है। गुनिया घास ( वैज्ञानिक का नाम - पानीकम मैक्सिमम ) की एक नई वैरायटी रूप में यह घास पोषक तत्वों से भरपूर है। गुनिया घास कई देशों में पहले से ही उगाया जा रहा है। भारत में भी इसका प्रयोग बहुतायत में किया जाता है। सेंट्रल वेराइटल रिलीज कमेटी ने हाल ही में गुनिया घास की नई किस्म बुंदेल गुनिया-1 ( जएचजीजी. 96-5 ) के व्यावसायिक उपयोग की अनुमति दी है। इसे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित किया गया है। गुनिया घास की यह किस्म विशेष कर सूखे क्षेत्रों के लिए तैयार की गई है। यह दूसरी गुनिया किस्मों से हर मामले में बेहतर है। देसरी किस्मो के मुकाबले इसकी उत्पादकता 7.6 फीसदी अधिक होती है। इसके अलावा इसमें क्रूड प्रोटीन की मात्रा भी दूसरी किस्मों के मुकाबले चार गुना ज्यादा होती है। गुनिया घास में प्रोटीन की मात्रा इसकी कटाई के समय पर निर्भर करती है। नई किस्म की गुनिया के पत्तों को यदि शुरूआती समय में काटा जाये तो उसमें और भी ज्यादा प्रोटीन होती है। आगे 45 दिनों के बाद इसमें प्रोटीन की मात्रा घट जाती है। सामान्य गुनिया घास की तरह इसे भी सर्दियों के दो महीने छोड़कर साल भर काटा जा सकता है। सूखे क्षेत्रों में बुंदेल गुनिया की उत्पादकता 40 से 75 टन प्रति हैक्टेयर रहती है जबकि सिंचित क्षेत्रो में इससे 160 टन प्रति हैक्टेयर तक पैदावार ली जा सकती है। सामान्य किस्मों से 150 टन प्रति हैक्टेयर तक पैदावार होती है। इसकी पहली कटाई लगाने के 75 दिनों के बाद की जा सकती है। उसके बाद 45 दिनों के अंतराल के बाद लगातार कटाई की जा सकती है। बुंदेली किस्म को विशेषकर मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, हिमांचल प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उगाया जा सकता है। उत्तर भारत में नर्सरी में इसकी बुवाई करने का सही समय मार्च महीने का होता है। बाद में जुलाई में मानसून आने पर इसे खेतों में रोप दिया जाता है। इसके अलावा दक्षिण भारत में साल भर इसकी बुवाई की जा सकती है। देश भर में लगातार बढ़ती दूध और मीट की मांग को देखते हुए इस घास की बाजार कीमत में काफी बढ़ोत्तरी हो गई है।
साभार दैनिक भास्कर

गाँव में रोजगार व पंचायतों की भूमिका

"सरकारों के सामने यक्ष प्रश्न है कि ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक से अधिक रोजगार के अवसर कैसे पैदा हों, दरअसल जरूरत इसके मूल में जाने कि है, पहले यह तो तय किया जाए कि असल में ये युवा बेरोजगार क्यों है ? समस्या को उठाया है टीकमगढ़ कि अतिरिक्त जिला कार्यक्रम प्रबंधक सुश्री स्वल्पना तिवारी ने। तेजस्विनी कार्यक्रम के अर्न्तगत महिलाओं के लिए रोजगार चयन कि बात प्रारम्भ हो चुकी है, अतः ये विचार प्रासंगिक हैं साथ ही दिशा देने वाले भी, कृपया इस चर्चा को आगे बढायें ..........
आपके विचारों का स्वागत है
आज ग्रामीण परिदृष्य कमोवेश यही है,कि कुछ पढ़ा लिखा युवा वर्ग अपनी श्रम शक्ति की अनुपयोगिता के चलते बेकार घूमते-फिरते अपना भविष्य बर्बाद कर रहे हैं। यह इसलिए नहीं कि वे अकर्मण्य हैं, यह तो इस कारण कि उनकी क्षमतानुकूल रोजगार या स्वरोजगार उपलब्ध नहीं है। आप चाहे तो किसी भी युवा को रोक कर पूछ सकते है कि भई क्या कर रहे हैं । जबाब घुमा फिरा कर यही होगा रोजगार की तलाश । बात यहीं नहीं खत्म होती समस्या तो और दुरुह तब होती है जबकि हम देखते हैं, लोगों की विषमताऐं मात्र सामाजिक, आर्थिक या भौगौलिक नहीं है। वरन उनके कार्य करने की आदतें व आवश्यकताएं भी भिन्न हैं ऐसी स्थिति में ही पंचायतों की सार्थकता समझ आती है। प्रत्येक पंचायतें अपने लोगों की आवश्यकता व क्षमताओं को ध्यान में रखते हुये स्थानीय उपलब्धताओं व बाह्य सहयोग के आधार पर रोजगार उपलब्ध करवाने का प्रयास कर सकती हैं। ये क्षेत्र सामान्यतः कृषि,पशुपालन ,लघुउधोग, वन व खनन आधारित हो सकते हैं। यह तो सभी जानते है,कि अंतिम छोर का व्यक्ति गरीब है। इसके लिये सरकारें अथक प्रयासों से गरीबी दूर करने के लिए अनेकों योजनाऐं तैयार कर उन्हें लागू भी करतीं हैं। किन्तु फ्रिक के साथ रणनीति तय करने की जरुरत यह है, कि योजनाओं की विस्तृत व सही जानकारी उस अंतिम व्यक्ति तक समय पर उपलब्ध हो सके।
पंचायती राज व्यवस्था के पश्चात यह अपेक्षा रही कि यह कमी अब पंचायतों के दायित्व निर्वहन से दूर होगी । किन्तु विडम्बना यह है, कि आज भी वास्तविक हितग्राही तक या कहें जन-जन तक पूर्ण जानकारी का अभाव यथावत विधमान है। यही कारण है कि इतनी सार्थक योजनायें भी गरीबी कम नहीं कर पा रहीं हैं। यहीं गांव की पंचायतें लोगों की मदद कर सकती हैं। पंचायतों की बैठकों में सरकारी अमले को बुलाकर योजनाओं व कार्यक्रमों की जानकारी ली जाकर समस्त ग्रामवासियों तक पहुंचायी जाए ।
ग्राम व ग्रामवासियों की दशा सुधारने की जटिल समस्या आज सभी पंचायतों, विभागों व गैर सरकारी संगठनों के सामने अपना विकराल रुप धर कर खड़ी हैं। इसके लिये अतिरिक्त प्रयत्नों की आवश्यकता तो है ही किन्तु इन प्रयत्नों को सूक्ष्म से बृहद की दिशा में देखने की आवश्यकता होगी । इसके लिये हमारे रणनीतिकारों व सामाजिक योद्धाओं को स्वरोजगार की दिशा व भी दशा को समझना होगा । तभी हम ग्रामीण स्तर पर रोजगार को सुनिश्चित कर जीवन स्तर में सुधार के साथ-साथ पलायन जैसी समस्या से निजात पा सकेगे।

स्वल्पना तिवारी ,
अतिरिक्त जिला कार्यक्रम प्रबंधक,
तेजस्विनी टीकमगढ़ म.प्र.