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महिला सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय नीति

भारत सरकार ने देश में महिलाओं की स्थिति सुधारने का लक्ष्य हासिल करने के लिए वर्ष 2001 में महिला सशक्तिकरण हेतु राष्ट्रिय नीति जारी की। भारतीय संविधान की प्रस्तावना, मूल अधिकार, मूल कर्तव्य और राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में लिंग समानता का सिद्धांत अंतर्निहित है। संविधान में न केवल महिलाओं को बराबरी की दर्जा दिया गया है, बल्कि इसमें राज्यों को इस बात के भी अधिकार दिये गये है कि वे महिला हितों के लिए आवश्यक कदम भी उठा सकते हैं।
एक लोकतान्त्रिक नीति की रूपरेखा के अंतर्गत हमारे कानून, विकास नीतियां, योजनाएं और कार्यक्रम विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के विकास को लक्षित करती है। 1977-78 की पांचवी पंचवर्षीय योजना से महिलाओं से जुडे़ उनके कल्याण से लेकर विकास तक के मुद्दे हल करने के दृष्टिकोण में एक उल्लेखनीय परिवर्तन आया है।
हालिया सालों में महिलाओं की स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए महिला सशक्तिकरण को केन्द्रीय मुद्दे के रूप में जगह दी गयी है। महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और कानूनी हक प्रदान करने के लिए 1990 में संसद में पारित एक कानून के जरिए ‘‘राष्ट्रीय महिला आयोग‘‘ का गठन किया। संविधान के 73वें व 74वें संशोधन के जरिए महिलाओं के लिए पंचायतों व नगर निगमों में स्थान आरक्षित किये गये। इससे स्थानीय स्तर पर नीति निर्माण व निर्णय निर्धारण में महिलाओं की भागीदारी की मज़बूत नीवं तैयार हुई।
भारत ने महिलाओं के बराबरी के अधिकार को सुरक्षित करने के प्रति वचनबद्ध अनेक अंतर्राष्ट्रीय संधियों व मानवाधिकार समझौतों का अनुमोदन भी किया है। इनमें 1993 की महिलाओं के प्रति सभी तरह के भेदभाव को समाप्त करने की संधि, 1985 की नैरोंबी प्रगतिशील रणनीति संधि, 1995 की बीजिंग घोषणा व प्लेटफार्म फॉर एक्शन संधि, 1975 की मैक्सिको कार्ययोजना और संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा स्वीकृत 21वीं शताब्दी के लिए लिंग समानता और विकास व शांति पर घोषणा पत्र शामिल है।
महिला सशक्तिकरण की राष्ट्रीय नीति में इस मुद्दे से जुड़ी अन्य नीतियों व नोवीं पंचवर्षिय योजना में किये गये वायदों का भी उल्लेख है।

महिला सशक्तिकरण नीति के उद्देश्य -
- आर्थिक व सामाजिक नीतियों के जरिए महिलाओं के विकास के लिए वातावरण तैयार करना।
- राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नागरिक , सभी क्षेत्रों में पुरूषों के बराबरी के आधार पर सभी मानवाधिकारों व मूल स्वतंत्रता का महिलाओं को लाभ पहुंचाना।
- राजनैतिक, आर्थिक , सामाजिक, सांस्कृतिक और नागरिक , सभी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी व निर्णय निर्धारण में महिलाओं को बराबर अवसर प्रदान करना।
- सभी स्तरों पर स्वास्थ्य देखभाल, गुणात्मक शिक्षा, व्यावसायिक मार्गदर्शन, रोजगार, मेहनताना, पेशेगत स्वास्थ्य व सुरक्षा , सामाजिक सुरक्षा आदि में बराबर अवसर प्रदान करना।
- महिलाओं के खिलाफ होने वाले सभी तरह के भेदभाव को दूर करने के लिए कानूनी तंत्र को मज़बूत बनाना।
- पुरूषों व महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के जरिए सामाजिक दृष्टिकोण व सामुदायिक प्रथा में बदलाव लाना।
- महिलाओं के खिलाफ होने वाली सभी तरह की हिंसा को रोकना।
- नागरिक संगठनों, खासतौर पर महिलाओं के संगठनों के साथ साझेदारी स्थापित करना व उसे मज़बूत बनाना।
महिला सशक्तिकरण - वैश्विक स्थिति
पिछले तीन दशकों में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता को बढ़ाने वाले कदमों या उपायों के जरिए महिलाओं के सशक्तिकरण की आवश्यकता और मूलभूत मानवाधिकारों तक महिलाओं की पहुंच, पोषण व स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार के बारे में जागरूकता बढ़ी है। महिलाओं के दूसरे दर्ज का नागरिक होने के बारे में जागरूकता बढ़ने के साथ-साथ जाति, वर्ग, आयु और धार्मिकता जैसे दूसरे कारकों के संबंध में समाजिक-सांस्कृतिक अनुकूलन के रूप में लिंग की धारणा ने भी जन्म लिया है। लिंग असल में महिलाओं का पर्यायवाची नहीं है और न ही पुरूषों के हितों की हानि दर्शाने वाला शून्य अंक वाला खेल है। इसके विपरित यह महिलाओं व पुरूषों दोंनो से और उनकी एक दूसरे के सापेक्ष स्थिति से संबंधित है । लिंग समानता मानव के सामाजिक विकास की ऐसी स्थिति को दर्शाती है जिसमें व्यक्तियों के अधिकारों जिम्मेदारियों और अवसरों को उनके महिला या पुरूष के रूप में जन्म लेने के तथ्य से तय नहीं किया जायेगा। दूसरे शब्दों में लिग समानता ऐसी स्थिति होगी जिसमें पुरूष और महिला दोनों ही अपनी पूरी क्षमता की अनुभूति करेंगे।
विश्व स्तर पर लिंग समानता स्थापित करने की महत्ता को ध्यान में रखकर संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के अंतर्गत 1984 में अलग फण्ड के रूप में संयुक्त राष्ट्र महिला विकास फण्ड की स्थापना की गयी। उस समय संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसे मुख्यधारा की गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने का कार्य सौंपा। 1995 की महिलाओं पर हुई बीजिंग विश्व बैठक में घोषित प्लेटफार्म आॅफ एक्शन ने इस परिकल्पना को और विस्तार दिया। प्लेट फार्म आफ एक्शन में इसे लिंग मुख्यधारा कहा गया और सभी नीति निर्माण, अनुसंधान योजना निर्माण, समर्थन व सलाह , विकास क्रियान्वयन और संचालन तक लिंग परिदृश्य का उपयोग है।
लिंग समानता हासिल करने का संयुक्त राष्ट्र और दूसरी कई एजेसिंयों का कार्य एक दूसरे से नजदीकी रूप से जुड़े तीन क्षेत्रों की ओर अभिमुख है। महिलाओं की आर्थिक क्षमता को मजबूती प्रदान करना जिसमें नई तकनीकी और नए व्यापार एजेण्डा पर ध्यान केन्द्रित है , महिला नेतृत्व और राजनीतिक भागीदारी को प्रोत्साहन देना और महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा को समाप्त करना। इससे यह स्पष्ट है कि महिलाओं के लिए बराबरी का दर्जा हासिल करने के लिए अभी बहुत लम्बा फासला तय करना है और इस कार्य के लिए कई मंचों पर एकाग्र प्रयासों की आवश्यकता है।

(राजीव श्रीवास्तव)
अतिरिक्त जिला कार्यक्रम प्रबंधक
तेजस्विनी ग्रामीण महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम
जिला छतरपुर (म.प्र.)
स्रोतः समसामयिकी महासागर, 2009

आत्मसम्मान

टिनडिनी गॅाव की एक और कहानी यह बताती है कि जाति प्रथा से कैसे लोग आपस में एक दूसरे को सह नहीं पाते है। समूह ने लोगों के मन से यह भावना दूर करने का प्रयास किया है। यह समझाया है कि अगर सब लोग मिल जुल कर काम करें तो हर काम आसान हो जाता है।

छतरपुर के पास एक बड़ा गाॅव है जिस का नाम ’टिनडिनी’ है। यहॅा लगभग छः सौ परिवार रहते हैं जिनमें सभी जाति के लोग रहते हंै। दो स्व सहायता समूह की सदस्यायें दलित जाति की हैं और एक समूह में सब तरह के लोग हैं। एक बार तीनों समूहों की सामूहिक बैठक उसी गाॅव में रखी गयी।बैठक के दौरान एक समूह की सदस्य बिल्लूबाई जो दलित जाति की हैं जमीन पर बैठे बैठे उनके पैरों में दर्द होने लगा तो बिल्लू बाई पास में ही रखे एक स्टूल पर बैठ गई । इस बात को देखते ही बैठक में तुरन्त हलचल मच गई कि दलित जाति के लोगों की बैठने की हिम्मत कैसे कर सकती है? क्योंकि दलित जाति के लोगों की बैठने की जगह तो जमीन पर थी । उच्च जाति के सदस्यों व आम लेागेां ने इस पर आपत्ति ली। बात तत्काल तो संभाल ली गयी लेकिन यह घटना दलित महिलाओं के मन में बैठ गयी इस पर दलित सदस्यों ने अपनी आवाज बार बार उठायी उनका साथ दलितों के साथ गांव के समझदार लोंगों ने भी दिया। दलित महिलाओं का कहना था कि बिल्लू बाई ने कोई गलत काम नहीं किया था।इस पर ग्राम पंचायत की बैठक बुलायी गयी और सबने देखा कि दलित महिलायें अपने मत में एकजुट थीं। उच्च जाति की सदस्यों ने अपनी हार मान ली और धीरे-धीरे अब दोनों तरफ की महिलाओं में अच्छे सम्बन्ध हैं। वे एक दूसरे की बैठक में भाग लेती हैं। अब उन में छूआछूत की भावना नहीं है। दलित महिलायें भी अब सर उठा कर जीना सीख गई हैं। इस घटना ने एक बडे़ सामाजिक बदलाव की नींव टिनडिनी ग्राम में रखी।( अन्य कार्यक्रमों का अनुभव )

प्यासे के पास पहुँचा कुँआ - गरीबों की मदद दरवाजे पर

" एक ओर जहां आये दिन यह समाचार पडने और सुनने को मिलते है कि बैंक में खाता खोलने आये लोंगों को बैंक वालों ने बिना खाता खोले दुत्कार कर भगा दिया वहीं मघ्यभारत ग्रामीण बमीठा प्रबंधक श्री बी.एस. वाजपेयी ने गांव जाकर तेजस्विनी समूहों के बचत खाता खोलने की अनूठी मिशाल प्रस्तुत की है।"

ग्राम झमटुली में गठित किये गये सीता तेजस्विनी महिला स्वसहायता समूह एवं राधा तेजस्विनी महिला स्वसहायता समूह की सदस्यायें बैंक की इस पहल से गदगद हुये बिना नहीं रह सकीं। श्री वाजपेयी ने समूह के कैशबुक, लेजर, सदस्य पासबुक कैश बॉक्स आदि समस्त रिकार्ड का अवलोकन किया और उनके अच्छे व्यवस्थापन और सामाजिक गतिविधियों के लिये समूह सदस्यों को बधाई दी। उन्होने शिक्षा का महत्व बताते हुये कहा कि अगर महिलाओं को विकासकरना है तो शिक्षित होना पडेगा। श्री वाजपेयी ने महिलाओं के विकास के लिये स्वसहायता समूहों की महत्वपूर्ण भूमिका के विषय में चर्चा करते हुये कहा कि समूहों के माध्यम से महिलाओं का न केवल सामाजिक विकास होता है वल्कि वह रोजगार से जुडकर अपने परिवार तथा अपने क्षेत्र का विकास करने में सहयोगी बनती है।
उक्त कार्यक्रम में तेजस्विनी ग्रामीण महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम के अतिरिक्त कार्यक्रम प्रबंधक श्री राजीव श्रीवास्तव, दर्शना महिला कल्याण समिति के अध्यक्ष श्री सूर्य प्रताप सिंह बुन्देला लोकेशन समन्वय श्री मनोज जैन कम्युनिटी मोवलाइजर श्री रमेश पाल उपस्थित थे ।

मनोज जैन,
समन्वयक दर्शना महिला कल्याण समिति,
तेजस्विनी कार्यक्रम ,
बमीठा जिला छतरपुर

सहस्त्राब्दि लक्ष्य और महिला सशक्तिकरण - महिला की जीत सबकी जीत है

बेहतरीन आलेख
"महिलाओं का सशक्तिकरण और उनमें निवेश टुकड़ों मे नहीं हो सकता है । इसे साधने की कोशिश किसी एक निर्धारित लक्ष्य को पाने के लिये की जा रही इक्का-दुक्का कार्यवाही तक ही सीमित नहीं कही जा सकती है, भले ही वह निकट भविष्य मे लाभकारी हो ।"
संयुक्त राष्ट्र ने 08 सहस्त्राब्दि लक्ष्य तय किये हैं जिन्हें वर्ष 2015 तक हासिल करने का वक्त तय किया गया है । इन्हीं 08 लक्ष्यों में से तीसरा लक्ष्य है स्त्री-पुरूष समानता और महिला शक्ति को बढ़ावा देना । संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान का कहना है कि ’’अगर 2015 तक सहस्त्राब्दि लक्ष्य हासिल करना है तो अब वक्त नहीं खोया जा सकता है, दुनियां की महिलाओं में निवेश करके ही हम इन लक्ष्यों को साधने की आशा करते हैं । तीसरा सहस्त्राब्दि लक्ष्य महिलाओं के खिलाफ भेदभाव को चुनौती देता है और लड़कियों और लड़कों को स्कूल जाने के लिए बराबरी का मौका देने की मांग करता है । इस लक्ष्य से जुड़े सूचकों का यह भी ध्येय है कि वो प्रगति का आंकलन करे जिससे यह सुनिश्चित हो कि ज्यादा से ज्यादा महिलाऐं पढ़ी लिखी हों, जननीति तय करने में उनकी आवाज और प्रतिनिधित्व हो, और उनके लिए नौकरी की बेहतर संभावनाऐं हों । लेकिन स्त्री पुरूष समानता का मुद्दा सिर्फ एक लक्ष्य तक सीमित नहीं है - यह सब पर लागू होता है । बगैर स्त्री पुरूष समानता के और महिलाओं के सशक्तिकरण के एक भी सहस्त्राब्दि लक्ष्य हासिल नहीं किया जा रहा है । पुरूषों से ज्यादा महिलाओं पर गरीबी का भार पड़ता है बच्चों की देखभाल का जिम्मा भी उन्हीं पर होता है । जीवनभर उन्हें हर क्षेत्र में और लगातार भेदभाव का शिकार होना पड़ता है । जब भी कोई महिला गर्भवती होती है उसका जीवन दाव पर होता है । एचआईवी एड्स जैसी भयानक बीमारियों का खतरा भी महिलाओं को बढ़ता ही जा रहा है । प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में महिलाओं की अनिवार्य भूमिका है, उन्हें पुरूषों जितने अधिकार मिलना चाहिए । महिलाओं के योगदान को पहचानने और उनके अधिकारों को सुरक्षित करने का असर आठों सहस्त्राब्दि लक्ष्यों पर पड़ेगा इन मुद्दों के निपटारे मे विफलता सहस्त्राब्दि लक्ष्यों को हासिल करने की कोशिश भी विफल कर देगी । महिलाओं के अधिकार सुरक्षित करने से सभी को चौतरफा फायदा होगा । सहस्त्राब्दि लक्ष्यों की कड़िया तंग नहीं बल्कि बहुत व्यापक हैं ।
लड़कियों का स्कूल पहुंचना सिर्फ उनके लिए ही कल्याणकारी नहीं है शोध से पता चला है कि कुछ सालों की ही प्राथमिक शिक्षा पाने वाली महिलाओं का आर्थिक भविष्य सुधरने की संभावनाऐं बढ़ जाती है, वो कम बच्चे पैदा करती हैं जो ज्यादा स्वस्थ्य होते हैं और अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए भी ये महिलाऐं ज्यादा तैयार होती हैं । परिवारों और समाज को इसका बहुत फायदा मिलता है । गरीबी घटाने की मुहिम पर भी इसका सीधा और अविलंब असर होता है ।
महिलाओं का सशक्तिकरण और उनमें निवेश टुकड़ों मे नहीं हो सकता है । इसे साधने की कोशिश किसी एक निर्धारित लक्ष्य को पाने के लिये की जा रही इक्का-दुक्का कार्यवाही तक ही सीमित नहीं कही जा सकती है, भले ही वह निकट भविष्य मे लाभकारी हो । जब तक स्त्री पुरूष समानता का मुद्दा केन्द्र बिन्दु नहीं बन जाता है, जो फिर बाकी मुद्दों को वापिस मानव विकास पर खींच के ले जा सके, जब तक कि विकासशील देशों की महिलाऐं समानता के लिए और जवाबदेही की मांग करते हुये एकजुट नहीं होती है, जब तक कि गरीब देशों की चुनौतियों से निपटने के लिए हम सब अपनी विशेष कार्यवाही को विस्तृत नहीं करते हैं और हम मिलजुलकर काम नहीं करते हैं हमारे वादे वादे ही रहेंगे।
(साभार-बहाना नहीं चलेगा 2015 द मिलेनियम कैम्पेन)
प्रस्तुतकर्ता
राजीव श्रीवास्तव
अतिरिक्त जिला कार्यक्रम प्रबंधक तेजस्विनी, छतरपुर

हौसलों से उड़ान - महिला हिंसा पर समूहों की पहल

महिला हिंसा से पीड़ित समाज में आशा की किरण नजर आती है जब कोई महिला अपने लिये स्वयं पहल करती है और पूरा समाज उसे अपने लिये रास्ता बनाने में मदद करता है। जिला छतरपुर के राजनगर ब्लाक के ग्राम डहर्रा के समूहों ने इससे निपटने के लिये जो पहल की है जो सराहनीय ही नहीं स्तुत्य भी है -
मध्यप्रदेश के बुन्देलखण्ड को जहां अपने इतिहास के लिए जाना जाता है वहीं अपनी परम्पराओं तथा रीति- रिवाज के लिए पहचाना जाता है। यहां का समाज पुरूष प्रधान है, दुनिया जहाँ विकास की ओर जा रही है वहीँ बुन्देलखण्ड के ग्रामीण क्षेत्र आज भी पुरानी परंपराओं एवं रूढ़िवादिता व कुरीतियों के जाल मे जकड़े हुए हैं यदि इन ग्रामीण क्षेत्रो में महिलाओ की स्थिति की बात करे तो निर्णय लेने का सर्वाधिकार भी पुरूषो के साथ है यहां तक कि पत्नी प्रत्येक गतिविधि पति के निर्णय के आधार पर करती है। महिला सशक्तिकरण के लिए किये जा रहे प्रयासोंने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है और इसके उदाहरण स्वरूप ग्राम डहर्रा की निवासी राधाबाई की कहानी कुछ इस प्रकार है:-
ग्राम की एक महिला राधाबाई जो कि अपने परिवार के व अपने विकास के लिए समूह मे जुडना चाहती थी लेकिन उनका पति कभी नहीं चाहता था कि मेरी पत्नी समूह से जुड़े और उसे कोई जानकारी प्राप्त हो इस हेतु बडी मसक्कत के बाद तैयार हुए इसी प्रकार पति की सहमति के बाद एकता समूह से जुड़ी समूह की गतिविधियो मे बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगी। परिवार की जिम्मेदारियों को पूर्ण करते हुए बच्चों की पूरी देखभाल भी पूरी जिम्मवारी से की तथा समूह की गतिविधि में भी अपनी बराबर भागीदारी रखी। बचत समय पर जमा करना ,बैठक की चर्चा में भाग लेना इस तरह अपनी भविष्य की तस्वीर को अच्छा व सशक्त देखने हेतु निरन्तर प्रयास कर रही थी। अब धीरे धीरे पति का विरोध शरू हो गया । पति का बेबजह डांटना, मारना, चिल्लाना आम बात हो गयी।
तेजस्विनी कार्यक्रम में महिला हिंसा पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें तेजस्विनी समूह की कई महिलाओं ने भाग लिया। इस कार्यशाला में राधाबाई भी शामिल हुई। कार्यशाला में महिला हिंसा जैसे शारीरिक, मानसिक एवं यौन हिंसा के बारे मे विस्तार से जानकारी दी गई । महिलाओं ने उसे पूरी गम्भीरता से लिया ,समूह की सदस्य राधाबाई महिला हिंसा के अंतर्गत शारीरिक हिंसा से अत्यधिक पीड़ित थी समूह की अन्य महिलाओं को राधाबाई की व्यथा से दुखित होकर महिलाओं ने उसके पति को समझाने का प्रयास किया जिस पर पति ने सार्वजनिक रूप राधा बाई की पिटाई कर दी,जिसका समूह कि महिलाओं ने न केवल विरोध किया, बल्कि महिला हिंसा पर बने कानून के बारे में भी बताया।इसके बाद पति ने समूह से अलग होने हेतु दबाब डाला तथा समन्वयक एवं मोबलाइजर से बात की, इस पर उसको बहुत समझाया गया,समूह द्वारा कहा गया कि राधाबाई स्वयं अपना नाम कटवाना चाहे तब ही उसका नाम काटा जा सकता है।
राधाबाई का दृढ़ संकल्प था कि उसको समूह में रहना है उसके लिये उसने परिवार ,पति का लाख विरोध सहा लेकिन समूह नहीं छोडा एवं समूह ने भी उसका पूरा साथ दिया। अब धीरे धीरे उसने अपने पति को अपने बदलाव तथा जानकारियों मे हुई वृद्धि, बचत एवं दृढ़ संकल्प के दम पर अपने पक्ष में कर लिया, अब न तो पति रोकता है और न ही परेशान करता है।समूह की महिलाओ ने राधाबाई को खाता संचालन के लिये भी अधिकृत किया है। आज राधाबाई बैक में अकेले पैसा जमा करने जाती है। जिसमें उनका पति भी सहयोग करता है. ऐसे लोगों के लिये कहा जा सकता है कि:
मंजिले उन्ही को मिलती है
जिनके सपनो मे जान होती है
पंखो से कुछ नही होता है
हौंसलों से उड़ान होती है।
मनोज नायक
जिला कार्यक्रम प्रबंधक
जिला छतरपुर
पात्रों के नाम परिवर्तित किए गए हैं।

बीडी छोड़ बचत की ओर.........

तेजस्विनी कार्यक्रम का मुख्य पहलू महिला सशक्तिकरण एवं सामाजिक न्याय समानता की प्राप्ति के लिए कार्यक्रम से जुड़ी महिलाओं को समय समय पर सामाजिक मुद्दों बुराइयों, भ्रांतियों व शिक्षा और स्वास्थ्य के बारे में प्रशिक्षित किया जाता रहा है। इससे प्रभावित होकर ग्राम चैका-कोड की सुमंत्रा का तो जीवन ही बदल गया ।
गाँव में सुमंत्रा जब तब लोगो की चर्चा का विषय बन जाया करती थी। विशेष रूप से तब जब कोई बाहर से आकर महिलाओं के विकास और परिवर्तन की बातें और प्रयास करता। लोग, जिनमें महिलायें और पुरूष दोनों ही शामिल रहते ये कहते कभी न थकते कि हमारे गांव में और कोई नई रीति चले न चले लेकिन जो रीति सुमंत्रा अहिरवार ने चालू की है उसका कोई सानी नहीं। उनके कहने में भारी व्यग्ंय झलकता और वे यह कहते-कहते हंस पडते। सुमंत्रा की यह पहचान उसके बीड़ी पीने से हुई थी एक बैठक में वह बीड़ी का एक बंडल पी जाया करती थी। इस बात से उसको कोई लेनादेना नहीं रहता था कि उसके इस तरह से बीड़ी पीने से उसके क्या-क्या नुकसान उठाने पड रहे हैं ।तेजस्विनी कार्यक्रम की मोबलाइजर ने सुमंत्रा से मिलकर उसे समझाने का निश्चिय करके उसके घर की ओर चल दी । सुमंत्रा से मिली तब वह बीड़ी पी रही थी । मोबलाइजर ने सुमंत्रा को अपनी परिचय देकर समझाते हुये पूछा -
मोब.- क्या आप बहुत बीडी पीती हो..........?
सुमंत्रा- हां पीती हूं तुम्हे इससे क्या..........
मोब.- आप बीडी पीती हो तो क्या इसके लाभ हानि जानती हो ?
सुमंत्रा-अब इसमें लाभ और हानि किस बात का
मोब.- देखो एक तो इतनी मेहनत से कमाये गये रूपये बर्बाद होते है दूसरा नुकसान है कि मुंह से बदबू आती है तीसरा नुकसान यह है कि बीड़ी पीने से खांसी आती है चैथा नुकसान फेफडे खराब होते है और सबसे बडा नुकसान यह है कि कैंसर हो जाता है, और लोग पीठ पीछे हंसी उड़ाते हैं वह अलग।
सुमंत्रा-कहती तो तुम सही हो लेकिन आदत पड़ गई है अब तो ऊपर जाकर ही छूटेगी।
मोब.- ऐसा नहीं है आप चाहो तो आपकी यह आदत छूट सकती है। लोग बड़ी-बड़ी खराब आदतें छोड़ देते है और अपना बिखरा जीवन संवार लेते है, सोचिये आप यदि जिन रूपयों से बीड़ी पीती है उनकी बचत करने लगे तो कितना रूपया जुड सकता है। वह आपकी जरूरतों को पूरा करेगा और आपके बच्चों के भी काम आयेगा। आप चाहों तो आपके मोहल्ले में जो समूह बन रहा है उसमें जुड़ जाओ।
सुमंत्रा- समूह से क्या लाभ होगा...........
मोब.- पहला लाभ तो यह होगा कि जो लोग आपकी हंसी उडाते है वह आपकी साथी सहेली बन जायगीं। इसके अलावा कभी भी जरूरत पडने पर समूह की बचत से आपको कम ब्याज दर पर लोन मिल जायेगा, बैठको में आपको नई-नई योजनाओं की जानकारी मिलेगी अच्छी आदतें बनाने और बुरी आदतें छोडने के लिये सहेलियों से हिम्मत और मनोबल मिलेगा, आपके द्वारा तय किये गये काम का प्रशिक्षण और उसके लिये बैंक द्वारा सस्ती ब्याज दर पर राशि उपलब्ध करवाई जायेगी। अब बताओ कि फायदा है कि नहीं।
सुमंत्रा-हां, दीदी फायदा है हमें भी समूह में जुड़ना है।
इस तरह से सर्वसम्मति से सुमंत्रा अहिरवार एकता समूह में सदस्य बन गई और धीरे-धीरे उन्होंने अपनी बीड़ी की आदत को बिलकुल छोड़ दिया। आज सुमंत्रा बहुत खुश है, कहती है अब मेरी तबियत भी ठीक है और मेरे पास पैसे भी रहने लगे हैं।
बधाई बमीठा लोकेशन सेंटर के कम्युनिटी मोबलाईजर सुमंत्री अहिरवार और लोकेशन समन्वयक श्री मनोज जैन को जिनका प्रयास सफल रहा ।
मनोज नायक
जिला कार्यक्रम प्रबंधक छतरपुर